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Tuesday, January 27, 2009

ईश्वर का अस्तित्व

ईश्वर का अस्तित्व
इंग्लैंड की ४० प्रतिशत आबादी ईश्वर के होने पर शक कर रही है । ईश्वर में विश्वास न करने वाली नई पीढ़ी नें “ कदाचित ईश्वर नही है, इसलिए चिंता छोड़ो और जीवन का आनंद लो “जेसे होर्डिंग, स्लोगन और प्रचार के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति दर्शानी शुरू कर दी है ।
"प्रसिद्ध लेखक श्री खुशवन्त सिंह का मानना है , एशिया में नास्तिक लोग लगभग २ प्रतिशत हैं जिसमें एक मैं भी हूँ , जहाँ तक मेरी बात है में जीवन में सभी बढ़िया चीजों का मज़ा लेता हूँ – स्वादिष्ट भोजन, सिंगल माल्ट, स्कात्च, विंटेज वाइन और सुंदर महिलाएं।"
आज भारत में कुल आबादी का १६.२ प्रतिशत ऐसी जाति का समाज है जो सदियों से मंदिरों मैं जाने लिए लड़ता आ रहा है , और हालत यह है की काफी बड़ा वर्ग आज इन व्यवस्थाओं से बचने लगा है ।
"बाबा साहब भीम राव् अम्बेडकर ने भी अपने आप को नास्तिक कहा , पर एक दिन जब वह अपनी कार से घर आ रहे थे तो गाड़ी का अचानक एक्सीडेंट हो गया और उन्होंने घर आ कर अपने बेटे से कहा की आज मैं भगवान की कृपा से सकुशल बचा हूँ।"
"उडीसा के मन्दिर से एक दलित मंत्री के पूजा करने के बाद मन्दिर को धोना और मंत्री केद्वारा चडाया गया चडावा बहार फेंक देना किसकी आस्था को दर्शाता है , उन पुजारीओं की , जो आस्था का ढोंग कर , धर्मं के ठेकेदार बन , ईश्वर का डर दिखा कर समाज को गुमराह कर रहे हैं या ईश्वर से ज्यादा अपना अस्तित्व ज़माने का प्रयास कर रहे है ।"
इश्वर भक्ति या आस्था किसी के बताने, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च जाने से फलीभूत नही होती । यह तो एक शक्ति है जो जब चाहो वैसा साथ देती है । क्या ईश्वर में विश्वास रिश्वतखोर , आतंकी , हत्यारे , स्मगलर , दुष्कर्मी नही करते , न जाने कितने धार्मिक स्थानों पर इस प्रकार का पैसा लगा है । धार्मिक स्थानों पर होने वाले तमाम अनैतिक काम ऐसे हैं जिनको करने के बाद भी इंसान आस्था का चोला पहन कर ख़ुद को आस्थावान सिद्ध कर के समाज को ईश्वर के बारे मैं बताते हैं ।

कोई देवी देवताओं के नग्न चित्र बना कर दूसरे की आस्था पर हमला कर के अपनी पीठ ख़ुद थपथपाते हैं , कोई हजरत साहिब के बारे में ग़लत लिख कर स्वम्भू बनने का अथक प्रयास करते हैं ।
इस सब के पीछे ईश्वर का नहीं , बल्कि अपना अस्तित्व दिखाने का प्रयास है और यही कारण है जब इंसान अपने आप को ईश्वर से ऊपर समझ लेता है तब ईश्वर से भरोसा उठ जाता है .
एक वर्ग जो सबसे पहले इस की शुरुआत करता हे उसकी पहचान कुछ इस प्रकार है -
भोजन में आनंद
शराब में आनंद
महिलाओं में आनंद
बेईमानी, रिश्वत, अराजकता में आनंद
घमंडी आचरण में सुख की अनुभूति
दूसरे की बेईज्जती में आनंद
ये ही कारण है की आज इंग्लैंड का एक बहुत बड़ा वर्ग नास्तिक होने का दावा कर रहा है ,क्योंकि वह उपरोक्त सभी विचारों पर खरा उतरता हे।
मतलब साफ है "जब मुंह मोतियों से भरा हो , भगवान तब याद नही आता, यदि दो मोती नाक में फँस जाएँ , भगवान के सिवा कुछ याद नही आता"

मैं , ईश्वर में आस्था किसी डर या जरूरत के लिए नही बल्कि ऐसे समय में जब मन कहे की उस शक्ति को भी समय दो जिसके कारण यह संसार बना है आस्था रखता हूँ।
शांत प्रकाश