Monday, June 22, 2026

योग: साधना, विज्ञान और भारत की वैश्विक सांस्कृतिक विजय



लेखक: शांत प्रकाश जाटव

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को लेकर कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूह यह प्रचारित करते हैं कि योग का वैश्विक विस्तार केवल एक "पीआर अभियान" या "सरकारी तमाशा" है। यह दृष्टिकोण न केवल अधूरा है, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और उसकी आधुनिक वैश्विक उपलब्धियों को भी नजरअंदाज करता है।

सच्चाई यह है कि योग भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा की अमूल्य धरोहर है। महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित स्वरूप दिया, जबकि आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, बी.के.एस. अयंगर, परमहंस योगानंद और अनेक योगाचार्यों ने इसे विश्व तक पहुंचाया। स्वतंत्र भारत में विभिन्न सरकारों ने योग के विकास में योगदान दिया, लेकिन 21वीं सदी में योग को वैश्विक जनआंदोलन बनाने का कार्य अभूतपूर्व स्तर पर हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की ऐतिहासिक जीत

27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा। मात्र 75 दिनों के भीतर 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 177 देशों के समर्थन से 21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में किसी सांस्कृतिक प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में देशों का समर्थन मिलना एक असाधारण उपलब्धि थी। आज विश्व के 190 से अधिक देशों में योग दिवस आयोजित किया जाता है और करोड़ों लोग इसमें भाग लेते हैं।

क्या योग केवल एक कार्यक्रम है?

योग को केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित करके देखना गलत है। योग आज भारत के स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सेना, पुलिस, खेल संस्थानों, कॉरपोरेट जगत और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच चुका है।

भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार देशभर में हजारों योग प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए गए हैं। लाखों लोगों ने योग प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया है। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (MDNIY) और केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (CCRYN) जैसे संस्थान योग के वैज्ञानिक अध्ययन और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार

योग के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि सरकार केवल योग का प्रचार करती है और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं देती। लेकिन आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर पेश करते हैं।

AIIMS का विस्तार

2014 तक देश में केवल 7 AIIMS कार्यरत थे। आज 22 से अधिक AIIMS कार्यरत या शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल हैं, जबकि कई अन्य विभिन्न चरणों में हैं।

मेडिकल कॉलेजों में वृद्धि

  • वर्ष 2014 में देश में लगभग 387 मेडिकल कॉलेज थे।
  • वर्ष 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 780 से अधिक हो चुकी है।

अर्थात मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।

MBBS सीटों में वृद्धि

  • 2014 में लगभग 51,000 MBBS सीटें थीं।
  • 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1.18 लाख से अधिक हो गई।

यानी 130% से अधिक वृद्धि।

PG मेडिकल सीटों में वृद्धि

  • 2014 में लगभग 31,000 PG सीटें थीं।
  • आज यह संख्या 74,000 से अधिक है।

आयुष्मान भारत

आयुष्मान भारत योजना के तहत लगभग 12 करोड़ परिवारों को प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक की स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की गई है। करोड़ों मरीज इस योजना का लाभ प्राप्त कर चुके हैं।

स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र

देशभर में 1.75 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (पूर्व स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र) स्थापित किए गए हैं, जिनके माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं गांव-गांव तक पहुंच रही हैं।

योग और वैज्ञानिक अनुसंधान

कुछ लोग दावा करते हैं कि पूर्व में योग पर वैज्ञानिक अनुसंधान होता था जबकि आज केवल प्रचार हो रहा है। वास्तविकता यह है कि आज योग अनुसंधान पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक स्तर पर हो रहा है।

प्रमुख संस्थान

  • मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (नई दिल्ली)
  • केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (CCRYN)
  • अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विभिन्न शोध विभाग
  • आयुष मंत्रालय के अधीन अनेक अनुसंधान परियोजनाएं

आज मधुमेह, उच्च रक्तचाप, तनाव, अवसाद, मोटापा, अनिद्रा और जीवनशैली संबंधी रोगों पर योग आधारित अनुसंधान देश और विदेश में चल रहे हैं।

योग ने रोजगार के नए अवसर दिए

योग का वैश्विक विस्तार केवल सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं बल्कि आर्थिक अवसर भी है।

भारत का वेलनेस और योग उद्योग अरबों डॉलर का क्षेत्र बन चुका है। आज हजारों योग प्रशिक्षक, आयुष चिकित्सक, प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ, फिटनेस कोच और वेलनेस सलाहकार इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।

विश्व के अनेक देशों में भारतीय योग प्रशिक्षकों की मांग बढ़ी है। योग पर्यटन, वेलनेस रिट्रीट और आयुष आधारित सेवाओं ने लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराया है।

योग और भारत की सॉफ्ट पावर

दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी संस्कृति के माध्यम से प्रभाव बढ़ाते हैं।

  • अमेरिका हॉलीवुड और अंग्रेजी भाषा के माध्यम से।
  • चीन कन्फ्यूशियस संस्थानों के माध्यम से।
  • फ्रांस अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से।

भारत ने योग के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर स्थापित किया है। आज जब न्यूयॉर्क, पेरिस, लंदन, टोक्यो, मॉस्को, सिडनी और दुबई में लाखों लोग योग करते हैं तो यह केवल स्वास्थ्य गतिविधि नहीं बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन भी है।

योग किसी दल का नहीं, भारत का है

योग न कांग्रेस का है, न भाजपा का। योग न वामपंथ का है, न दक्षिणपंथ का। योग भारत की आत्मा का हिस्सा है।

नेहरू काल, इंदिरा गांधी काल, मोरारजी देसाई काल और बाद की विभिन्न सरकारों ने योग के विकास में योगदान दिया। उस योगदान का सम्मान होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि 2014 के बाद योग को जो वैश्विक पहचान मिली, वह भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

निष्कर्ष

यदि किसी नीति की सफलता का मापदंड केवल आलोचना हो, तो कोई भी उपलब्धि स्वीकार नहीं की जाएगी। लेकिन तथ्य बताते हैं कि आज योग विश्वव्यापी जनआंदोलन बन चुका है। स्वास्थ्य क्षेत्र में AIIMS, मेडिकल कॉलेजों, MBBS सीटों, आयुष्मान भारत और स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार हुआ है। योग अनुसंधान, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। भारत की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा विश्व मंच पर मजबूत हुई है।

इसलिए योग को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय भारत की सभ्यता, स्वास्थ्य और मानव कल्याण के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।

योग तमाशा नहीं, भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक है।
योग केवल आसन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, स्वास्थ्य और मानवता के कल्याण का मार्ग है।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस लागू कराने में नेतृत्व और विभागीय समन्वय: एक विश्लेषणात्मक दृष्टि

लेखक: शांत प्रकाश जाटव

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और संतुलन का प्रतीक बन चुका है। लेकिन इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रिया रही, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), विदेश मंत्रालय (MEA) और संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजनयिक तंत्र के बीच मजबूत समन्वय देखने को मिला।

1. प्रधानमंत्री स्तर पर पहल और राजनीतिक नेतृत्व

2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा। यह केवल एक सांस्कृतिक सुझाव नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित कूटनीतिक पहल थी।

कई सार्वजनिक बयानों और साक्षात्कारों में यह बात सामने आई है कि इस पहल को केवल “प्रस्ताव” के रूप में नहीं, बल्कि एक वैश्विक सहमति बनाने वाले अभियान के रूप में आगे बढ़ाया गया। प्रधानमंत्री स्तर पर इसकी लगातार निगरानी की गई और विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों से सीधे संवाद भी किया गया।

2. विदेश मंत्रालय (MEA) की भूमिका और कूटनीतिक समन्वय

इस प्रस्ताव को सफल बनाने में विदेश मंत्रालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। UN में भारत के स्थायी मिशन ने विभिन्न देशों के साथ लगातार बातचीत की और समर्थन जुटाया।

  • अफ्रीकी, एशियाई और यूरोपीय देशों से समर्थन जुटाने के लिए बहुपक्षीय वार्ताएँ की गईं
  • छोटे और विकासशील देशों को योग के स्वास्थ्य लाभों के बारे में विस्तार से समझाया गया
  • भारत ने इसे किसी धार्मिक या राजनीतिक विषय के बजाय “वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन” के रूप में प्रस्तुत किया

परिणामस्वरूप, 177 देशों ने इस प्रस्ताव का सह-प्रायोजन (co-sponsorship) किया, जो संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है।

3. विभागीय और संस्थागत समन्वय

इस पहल में केवल विदेश मंत्रालय ही नहीं, बल्कि कई अन्य संस्थानों का भी योगदान रहा:

  • आयुष मंत्रालय (AYUSH) ने योग के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रमाण प्रस्तुत किए
  • भारतीय सांस्कृतिक संस्थानों ने योग को सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रस्तुत किया
  • विभिन्न योग गुरुओं और संस्थानों से परामर्श लेकर एक वैश्विक रूपरेखा तैयार की गई

यह समन्वय इस बात का उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र, सांस्कृतिक संस्थान और राजनीतिक नेतृत्व मिलकर एक वैश्विक पहल को सफल बना सकते हैं।

4. नेतृत्व और विभागों के बीच संबंध की विशेषता

इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि नेतृत्व और विभागों के बीच स्पष्ट लक्ष्य और निरंतर संवाद था।

  • प्रधानमंत्री स्तर पर स्पष्ट विज़न दिया गया
  • मंत्रालयों को स्वतंत्र रूप से तकनीकी और कूटनीतिक रणनीति तैयार करने की छूट मिली
  • UN मिशन ने फील्ड स्तर पर लगातार संवाद और वार्ता को आगे बढ़ाया

कुछ पूर्व राजनयिकों और सरकारी अधिकारियों के इंटरव्यू और सार्वजनिक टिप्पणियों में यह संकेत मिलता है कि यह अभियान “शीर्ष नेतृत्व की दिशा और पेशेवर कूटनीतिक टीम की मेहनत” का संयुक्त परिणाम था।

5. निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक प्रस्ताव की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत की सॉफ्ट पावर, कूटनीतिक क्षमता और प्रशासनिक समन्वय का उदाहरण है। यह दिखाता है कि जब नेतृत्व स्पष्ट हो और विभागीय तंत्र समन्वित होकर काम करे, तो वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

योग दिवस आज दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत की प्राचीन परंपराएँ आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का समाधान बन सकती हैं।

— शांत प्रकाश जाटव


Sunday, June 21, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंजीकरण क्यों नहीं है? तथ्य, कानून और वास्तविकता



लेखक शांत प्रकाश जाटव

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। संघ के लाखों स्वयंसेवक देशभर में विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक और सेवा गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद समय-समय पर एक प्रश्न चर्चा का विषय बनता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत संस्था है, और यदि नहीं, तो क्या इसका पंजीकरण होना आवश्यक है?

इस विषय पर अनेक प्रकार की धारणाएं प्रचलित हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रश्न को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तथ्य और कानून के आधार पर समझा जाए।

क्या भारत में हर संगठन का पंजीकरण अनिवार्य है?

भारतीय संविधान नागरिकों को संगठन बनाने और संचालित करने का अधिकार देता है। सामान्यतः किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन का अस्तित्व केवल इसलिए अवैध नहीं माना जाता क्योंकि उसका औपचारिक पंजीकरण नहीं है।

पंजीकरण कराने से संगठन को कई प्रशासनिक और कानूनी सुविधाएं मिलती हैं, जैसे:

  • अलग कानूनी पहचान,
  • संपत्ति का स्वामित्व,
  • बैंक खाते संचालित करने की सुविधा,
  • अनुबंध करने की क्षमता,
  • तथा न्यायालय में संगठन के नाम से कार्यवाही करने की सुविधा।

लेकिन प्रत्येक संगठन के लिए पंजीकरण हर स्थिति में अनिवार्य नहीं होता।

RSS की कानूनी स्थिति क्या है?

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि संघ बिना किसी संरचना के कार्य करता है। संघ का अपना लिखित संविधान है, जो उसकी कार्यप्रणाली, संगठनात्मक व्यवस्था और जिम्मेदारियों को निर्धारित करता है।

1949 में संघ ने लिखित संविधान क्यों अपनाया?

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद संघ और सरकार के बीच हुई प्रक्रियाओं के दौरान 1949 में संघ ने एक लिखित संविधान अपनाया।

प्रतिबंध हटने के बाद से संघ अपनी गतिविधियां इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित करता आ रहा है।

यदि RSS पंजीकृत नहीं है तो उसकी संपत्तियां और संस्थान कैसे संचालित होते हैं?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। वास्तविकता यह है कि संघ से संबंधित अनेक संस्थान, ट्रस्ट, समितियां, विद्यालय, प्रकाशन संस्थाएं और सेवा संगठन अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं।

इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से:

  • भूमि और भवनों का प्रबंधन,
  • बैंक खातों का संचालन,
  • वित्तीय लेन-देन,
  • दान का उपयोग,
  • तथा विभिन्न सामाजिक और सेवा परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।

अर्थात संगठनात्मक गतिविधियां और प्रशासनिक-वैधानिक व्यवस्थाएं अलग-अलग संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं।

क्या बिना पंजीकरण के संगठन चलाना गैरकानूनी है?

इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

भारतीय कानून में केवल पंजीकरण न होना किसी संगठन को स्वतः अवैध नहीं बनाता। किसी संगठन की वैधता का निर्धारण उसके कार्यों, कानून के पालन और संबंधित नियमों के अनुपालन के आधार पर किया जाता है।

इसलिए केवल इस आधार पर कि कोई संगठन पंजीकृत नहीं है, उसे गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

लोकतंत्र में प्रश्न पूछना भी आवश्यक है

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी बड़े संगठन, राजनीतिक दल, सामाजिक संस्था या वैचारिक संगठन के बारे में प्रश्न पूछना नागरिकों का अधिकार है। साथ ही तथ्यों के आधार पर उत्तर देना भी उतना ही आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति इस विषय पर अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, तो वह सार्वजनिक अभिलेखों, संबंधित विभागों के रिकॉर्ड तथा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के माध्यम से उपलब्ध सूचनाओं का अध्ययन कर सकता है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है, लेकिन इसका अपना लिखित संविधान और संगठनात्मक ढांचा है। संघ से संबंधित अनेक गतिविधियां विभिन्न पंजीकृत संस्थाओं और ट्रस्टों के माध्यम से संचालित होती हैं।

कानूनी दृष्टि से केवल पंजीकरण का अभाव किसी संगठन को अवैध नहीं बनाता। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय तथ्यों, कानून और उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों को आधार बनाना चाहिए, न कि केवल धारणाओं या राजनीतिक पूर्वाग्रहों को।


लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
नेता, भारतीय जनता पार्टी 

इंदिरा गांधी का दौर: क्या लोकतंत्र मजबूत हुआ या सत्ता का केंद्रीकरण?

कांग्रेस विभाजन, आपातकाल, दल-बदल और राज्य सरकारों की बर्खास्तगी का राजनीतिक विश्लेषण

लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

नेता भारतीय जनता पार्टी

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1966 से 1984 तक का कालखंड अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में श्रीमती इंदिरा गांधी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेता के रूप में उभरीं। उनके समर्थक उन्हें दृढ़ निश्चयी और निर्णायक प्रधानमंत्री मानते हैं, जबकि उनके आलोचक इस दौर को लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का काल बताते हैं।

आज भी भारतीय राजनीति में जब आपातकाल, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति की चर्चा होती है, तो इंदिरा गांधी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

1966: सत्ता की शुरुआत

लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। प्रारंभ में उन्हें कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त था, लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका पार्टी के पुराने नेतृत्व से टकराव शुरू हो गया।

1967: कांग्रेस की कमजोरी और दल-बदल की राजनीति

1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। पहली बार कांग्रेस को यह एहसास हुआ कि उसका राजनीतिक वर्चस्व चुनौती के घेरे में है।

इसी समय हरियाणा में "आया राम, गया राम" राजनीति का जन्म हुआ। विधायक और सांसद लगातार दल बदल रहे थे। उस समय कोई दल-बदल विरोधी कानून नहीं था।

1969: कांग्रेस का विभाजन

1969 में कांग्रेस दो भागों में बंट गई—

  • कांग्रेस (ओ)
  • कांग्रेस (आर) (इंदिरा गांधी गुट)

यह केवल संगठनात्मक विभाजन नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व-आधारित राजनीति की शुरुआत का बड़ा मोड़ माना जाता है। कांग्रेस के अधिकांश सांसद इंदिरा गांधी के साथ चले गए और पार्टी पर उनका व्यक्तिगत नियंत्रण बढ़ता गया।

बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्ति

इंदिरा गांधी ने 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। 1971 में पूर्व रियासतों के राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को समाप्त किया गया।

इन कदमों ने उन्हें गरीबों और मध्यम वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया, लेकिन आलोचकों ने इसे राजनीतिक समर्थन जुटाने की रणनीति भी बताया।

1971: भारी जीत और बढ़ती शक्ति

"गरीबी हटाओ" नारे के साथ इंदिरा गांधी ने 1971 का चुनाव भारी बहुमत से जीता। उसी वर्ष भारत-पाक युद्ध में विजय और बांग्लादेश के निर्माण ने उनकी लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया।

लेकिन इसी के साथ सत्ता का केंद्रीकरण भी बढ़ने लगा।

अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग

इंदिरा गांधी के शासनकाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग हुआ।

हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, ओडिशा, नागालैंड और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

आलोचकों का आरोप था कि कई मामलों में यह कदम संवैधानिक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए।

1975: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय – आपातकाल

25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया।

आपातकाल के दौरान:

  • विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया।
  • प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई।
  • नागरिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया।
  • राजनीतिक विरोध को दबाया गया।

जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस सहित अनेक विपक्षी नेता जेल में बंद रहे।

भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ की वैचारिक परंपरा में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार माना जाता है।

1976: तमिलनाडु की DMK सरकार की बर्खास्तगी

आपातकाल के दौरान तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त कर दिया गया।

यह घटना इस आरोप को और मजबूत करती है कि केंद्र सरकार राजनीतिक विरोध को समाप्त करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

42वाँ संविधान संशोधन

1976 में 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया गया।

कई संवैधानिक विशेषज्ञ इसे संविधान के इतिहास का सबसे विवादास्पद संशोधन मानते हैं क्योंकि इससे केंद्र सरकार की शक्तियाँ काफी बढ़ गईं।

1977: जनता का फैसला

आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए चुनाव में जनता ने अपना निर्णय सुना दिया।

कांग्रेस पराजित हुई और जनता पार्टी सत्ता में आई।

यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जाती है क्योंकि जनता ने मतदान के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कर दिखाया कि लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति या दल से बड़ा है।

1978–79: जनता पार्टी में टूट और कांग्रेस की वापसी की तैयारी

जनता पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ने लगे।

इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) के माध्यम से अपना संगठन फिर से मजबूत किया। कई नेता और जनप्रतिनिधि पुनः उनके साथ आने लगे।

1980: सत्ता में वापसी और 9 राज्य सरकारों की बर्खास्तगी

1980 में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं।

सत्ता में लौटने के तुरंत बाद नौ विपक्षी राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया:

  1. उत्तर प्रदेश
  2. बिहार
  3. मध्य प्रदेश
  4. राजस्थान
  5. गुजरात
  6. हरियाणा
  7. पंजाब
  8. ओडिशा
  9. महाराष्ट्र

आलोचकों ने इसे संघीय ढाँचे और राज्यों के जनादेश पर सीधा आघात बताया।

दल-बदल की राजनीति

इंदिरा गांधी के पूरे कार्यकाल में विभिन्न दलों के सांसद और विधायक कांग्रेस में शामिल होते रहे।

चूँकि दल-बदल विरोधी कानून नहीं था, इसलिए सरकारों को अस्थिर करना और राजनीतिक समर्थन जुटाना अपेक्षाकृत आसान था।

यही कारण है कि 1967 से 1985 का काल भारतीय राजनीति में दल-बदल के युग के रूप में जाना जाता है।

शाह आयोग की टिप्पणियाँ

जनता सरकार ने आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया।

आयोग ने कई मामलों में सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक अतिरेक पर गंभीर प्रश्न उठाए।

बाद में क्या बदला?

इंदिरा गांधी के काल के अनुभवों के बाद भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण सुधार हुए:

  • 1985 में दल-बदल विरोधी कानून लागू हुआ।
  • 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई फैसले ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण रोक लगाई।
  • राज्यों की निर्वाचित सरकारों को मनमाने ढंग से हटाना कठिन हो गया।

निष्कर्ष

इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की अत्यंत प्रभावशाली नेता थीं। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश निर्माण जैसी उपलब्धियाँ उनके नाम दर्ज हैं। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस का विभाजन, आपातकाल, अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति उनके शासनकाल के ऐसे पहलू हैं जिन पर आज भी गंभीर बहस होती है।

भाजपा और लोकतंत्र समर्थक विचारधारा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह काल हमें यह सीख देता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, सशक्त विपक्ष और जागरूक नागरिकों से होती है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि अंततः जनता ही सर्वोच्च होती है, और जनता का निर्णय किसी भी सरकार से बड़ा होता है।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भारतीय जनता पार्टी नेता

Thursday, May 28, 2026

कोलकाता में भारतीय जनता मजदूर संघ की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक संपन्न, राष्ट्रीय नेतृत्व रहा उपस्थित

कोलकाता में भारतीय जनता मजदूर संघ की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक संपन्न, राष्ट्रीय नेतृत्व रहा उपस्थित

मंगलवार दिनांक 26 मई 2026 को भारतीय जनता मजदूर संघ द्वारा कोलकाता के हाजरा मोड़ स्थित “सुजाता देवी स्मृति सदन” में पश्चिम बंगाल प्रदेश कार्यकारिणी की दिवसीय बैठक का भव्य आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण बैठक में संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शांत प्रकाश जाटव, पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष कपिला नंद चौधरी सहित राज्य के 24 जिलों से लगभग दो सौ से अधिक कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित सभी अतिथियों का उत्तरिय एवं पुष्पमाला पहनाकर भव्य स्वागत किया गया।

कार्यक्रम का सफल संचालन प्रदेश संगठन मंत्री प्रशांत कुमार दास द्वारा किया गया। बैठक के दौरान विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन द्वारा किए जा रहे कार्यों एवं जनसंपर्क गतिविधियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। कार्यकर्ताओं ने संगठन के विस्तार, श्रमिक हितों से जुड़े मुद्दों तथा सामाजिक कार्यों को लेकर अपने अनुभव भी साझा किए।

बैठक को संबोधित करते हुए पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष कपिला नंद चौधरी ने बताया कि वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल में संगठन के सदस्यों की संख्या लगभग साढ़े आठ लाख तक पहुंच चुकी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष के अंत तक यह संख्या दस लाख से अधिक हो जाएगी। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल क्षेत्र में संगठन की स्थिति अत्यंत मजबूत है और लगातार नए कार्यकर्ता संगठन से जुड़ रहे हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता मजदूर संघ किसी भी राजनीतिक संगठन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ नहीं है और यह पूरी तरह श्रमिकों एवं समाजहित में कार्य करने वाला संगठन है।

वहीं संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शांत प्रकाश जाटव ने अपने संबोधन में कहा कि पश्चिम बंगाल में संगठन पिछले सात वर्षों से लगातार सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि संगठन आज पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुआ है तथा शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी संगठन का तेजी से विस्तार हो रहा है। उन्होंने कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि आने वाले समय में संगठन और अधिक व्यापक स्तर पर श्रमिकों की आवाज़ बनेगा तथा समाज के हर वर्ग तक अपनी पहुंच मजबूत करेगा।

बैठक के दौरान संगठन की आगामी रणनीतियों, सदस्यता अभियान, श्रमिक कल्याण योजनाओं एवं संगठनात्मक विस्तार को लेकर भी विस्तृत चर्चा की गई। कार्यकर्ताओं में उत्साह और संगठन के प्रति समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन संगठन की मजबूती और श्रमिक हितों की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ।


Monday, April 27, 2026

श्रमिक वर्ग के लिए वरदान साबित हुई केंद्र सरकार की योजनाएं – शांत प्रकाश जाटव


दिनांक 26 अप्रैल 2026

श्रमिक वर्ग के लिए वरदान साबित हुई केंद्र सरकार की योजनाएं – शांत प्रकाश जाटव

भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS) के तत्वावधान में बहादराबाद, हरिद्वार में आयोजित “श्रमिक उत्थान एवं जन-जागरूकता सम्मेलन” सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता श्री शांत प्रकाश जाटव (राष्ट्रीय अध्यक्ष, BJMS) ने सभागार में उपस्थित जनसमूह के बीच लगभग 1 घंटा 20 मिनट तक केंद्र सरकार की योजनाओं, वैश्विक परिदृश्य (ईरान युद्ध), महिला सशक्तिकरण एवं श्रमिक अधिकार जैसे विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उपस्थित लोगों ने उनके वक्तव्य को ध्यानपूर्वक सुना और सराहा।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश में राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, गांव-गांव तक बिजली की पहुंच तथा आयुध (डिफेंस) सामग्रियों का निर्माण भारत में शुरू होना—ये सभी उपलब्धियां श्रमिकों की मेहनत का परिणाम हैं। जब देश में निर्माण कार्य होते हैं और उद्योग स्थापित होते हैं, तो रोजगार एवं व्यवसाय के नए अवसर उत्पन्न होते हैं, जिससे व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है और उसे रोजगार के लिए अन्य राज्यों में पलायन नहीं करना पड़ता।

उन्होंने आगे कहा कि एक उद्योग की स्थापना केवल कुछ श्रमिकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उससे जुड़े परिवहन, आवास, होटल, सब्जी विक्रेता, रेडी-पटरी, सप्लाई चेन सहित हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। एक उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50 हजार लोगों को लाभ पहुंचता है, जो राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

श्री जाटव ने BJMS के नारे का उल्लेख करते हुए कहा:
👉 “राष्ट्र के लिए करेंगे काम, नहीं करेंगे चक्का जाम।”

उन्होंने श्रमिकों को सकारात्मक और रचनात्मक आंदोलन का संदेश देते हुए कहा कि यदि किसी मांग को मनवाना हो तो कार्य बंद करने के बजाय उत्पादन बढ़ाकर भी अपनी बात प्रभावी ढंग से रखी जा सकती है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि जैसे जूते बनाने वाले कारीगर एक पैर का जूता बनाकर दूसरे पैर का जूता रोक सकते हैं, उसी प्रकार कार्य बंद किए बिना भी मांगों को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस विचार पर सभागार में उपस्थित लोगों ने जोरदार तालियों से समर्थन किया।

अपने वक्तव्य में उन्होंने केंद्र सरकार के प्रमुख निर्णयों—नोटबंदी, जीएसटी लागू करना, धारा 370 का निरस्तीकरण, राम मंदिर निर्माण—का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कदमों ने देश को नई दिशा दी है। साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना (करोड़ों मकान), स्वच्छ भारत मिशन (लगभग 14 करोड़ शौचालय), किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत योजना, तथा ई-श्रम पोर्टल, जन धन योजना, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं से श्रमिक वर्ग को व्यापक लाभ मिला है।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में:
श्री अजय चौहान (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष),
श्री चौधरी चरण सिंह (राष्ट्रीय महासचिव),
श्री प्रदीप कुमार (राष्ट्रीय सचिव),
श्री कुणाल (राष्ट्रीय सचिव),
श्री जितेंद्र सिंह (राष्ट्रीय सचिव),
श्री प्रवीण कुमार (प्रदेश सचिव, उत्तराखंड),
श्री पॉपिन कुमार मौर्य जी (जिला अध्यक्ष, हरिद्वार)

आदि शामिल रहे।

कार्यक्रम के उपरांत आयोजित पत्रकार वार्ता में पत्रकारों से बातचीत के दौरान श्री शांत प्रकाश जाटव ने कहा:
“यदि सरकार निरंतर 12 वर्षों से अच्छे कार्य कर रही है, तो उन अच्छे कार्यों का उल्लेख करना हमारा कर्तव्य है।”

कार्यक्रम में उपस्थित सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई दी गई।

सूचना विभाग 
भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS)


Tuesday, March 24, 2026

डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी (यशोदा मेडिसिटी) द्वारा मेरी पत्नी अंजू जी का किडनी स्टोन (Left Renal Calculus) के सफल उपचार एवं DJ स्टेंट रिमूवल


डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी (यशोदा मेडिसिटी) द्वारा मेरी पत्नी अंजू जी का किडनी स्टोन (Left Renal Calculus) के सफल उपचार एवं DJ स्टेंट रिमूवल अत्यंत कुशलता और संवेदनशीलता के साथ किया गया।

उनकी विशेषज्ञता, सटीक निर्णय क्षमता और मरीज के प्रति समर्पण वास्तव में सराहनीय है। पूरे उपचार के दौरान हमें पूरा विश्वास और संतोष मिला।

डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी एवं उनकी पूरी टीम का हृदय से आभार। 🙏

#DrKuldeepAggarwal #YashodaMedicity #KidneyStone #DJStent #SuccessfulTreatment #Gratitude

— शांत प्रकाश जाटव

Saturday, December 13, 2025

दिल्ली होमगार्ड साथियों के प्रति जिम्मेदारी: एक सतत दायित्व

दिल्ली होमगार्ड साथियों के प्रति जिम्मेदारी: एक सतत दायित्व

दिल्ली के होमगार्ड / गृह रक्षक साथियों से जुड़े विषय जब मेरे संज्ञान में आए, तब मैंने इसे केवल एक समस्या नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।
होमगार्ड बल अनुशासन, सेवा और समर्पण का प्रतीक है, और ऐसे बल के जवानों की आजीविका एवं सम्मान से जुड़ा कोई भी विषय अनदेखा नहीं किया जा सकता।
इसी जिम्मेदारी के तहत मैंने समय-समय पर गृह मंत्रालय, माननीय उपराज्यपाल महोदय, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, होमगार्ड विभाग के महानिदेशक तथा डीटीसी को पत्र लिखकर दिल्ली होमगार्ड साथियों की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया, ताकि प्रशासनिक स्तर पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण बन सके।

मेरा स्पष्ट मत रहा है कि संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मार्ग के माध्यम से ही किसी भी विषय का स्थायी समाधान संभव है।
सरकार से टकराव नहीं, बल्कि तथ्यों और एकता के साथ अपनी बात रखना ही सही दिशा है।

यह कोई एक बार का प्रयास नहीं है, बल्कि एक निरंतर दायित्व है—
और जब तक दिल्ली के किसी भी होमगार्ड साथी की सेवा, सम्मान या रोजगार से जुड़ा प्रश्न रहेगा, तब तक यह विषय जिम्मेदारी के साथ संबंधित मंचों तक पहुँचाया जाता रहेगा।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता मजदूर संघ