Wednesday, October 28, 2026

मेरे सार्वजनिक जीवन की स्मृतियाँ

मेरे निवास का वह सोफा और कुर्सी, जिनसे जुड़ी हैं देश की अनेक महान विभूतियों की अविस्मरणीय स्मृतियाँ



कुछ स्थान केवल मकान नहीं होते, वे जीवन की यात्रा, संगठनात्मक समर्पण, आत्मीय संबंधों और इतिहास की यादों के साक्षी बन जाते हैं।

लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भाजपा नेता एवं पूर्व राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा

जीवन में कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जिनका महत्व समय बीतने के साथ और अधिक बढ़ जाता है। कभी वे मुलाकातें सामान्य लगती हैं, लेकिन वर्षों बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एहसास होता है कि वे हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर बन चुकी हैं।

आज अपने निवास के कमरे में बैठे-बैठे जब मेरी दृष्टि उस पुराने सोफे और कुर्सी पर पड़ी, तो मन अतीत की अनेक यादों में खो गया। आँखों के सामने वे दिन जीवंत हो उठे, जब भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक कार्यों, चुनाव अभियानों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों के सिलसिले में अनेक वरिष्ठ नेताओं और संगठन के मार्गदर्शकों का मेरे निवास पर आगमन हुआ करता था।

मेरे लिए यह अत्यंत गर्व और आत्मीयता का विषय है कि जिन व्यक्तित्वों ने कभी मेरे घर के इसी बैठक कक्ष में बैठकर कार्यकर्ताओं से संवाद किया, चुनावी रणनीतियों पर चर्चा की और संगठनात्मक विषयों पर विचार-विमर्श किया, उनमें से अनेक आगे चलकर मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, राज्यसभा सांसद और भारत के राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे।

आज जब मैं अपने कमरे की इन वस्तुओं को देखता हूँ, तो मुझे केवल पुराना समय याद नहीं आता, बल्कि अपने सार्वजनिक जीवन की वह यात्रा भी याद आती है, जिसमें संगठन, समाज, आत्मीय संबंध और राष्ट्रसेवा की भावना प्रमुख रही है।

वर्ष 2006 का नगर निकाय चुनाव: मेरा निवास बना चुनावी बैठकों का केंद्र

वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव के दौरान वार्ड संख्या 49 से श्रीमती विमला रावत प्रत्याशी थीं और गाजियाबाद के महापौर पद के लिए श्रीमती दमयंती गोयल चुनाव मैदान में थीं। उस समय वार्ड संख्या 49 से संबंधित अधिकांश चुनावी बैठकें मेरे निवास पर आयोजित होती थीं।

कार्यकर्ताओं का आना-जाना, चुनावी चर्चाएँ, जनसंपर्क की योजनाएँ और संगठन के साथियों का उत्साह उस समय के वातावरण को जीवंत बनाए रखते थे। इसी चुनाव में श्रीमती दमयंती गोयल भारी मतों से विजयी हुईं और गाजियाबाद की महापौर बनीं।

चुनाव प्रचार के दौरान मेरे निवास पर राज्यसभा सांसद श्री भुवन चंद्र खंडूरी जी का भी आगमन हुआ। वे लगभग आधा दिन मेरे निवास पर रुके और कार्यकर्ताओं के साथ समय बिताया। बाद में उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला।

आज उन दिनों को याद करता हूँ, तो अनुभव होता है कि कार्यकर्ताओं के घर केवल बैठक करने के स्थान नहीं होते, बल्कि वे संगठनात्मक विश्वास, संवाद और आत्मीय संबंधों के महत्वपूर्ण केंद्र भी होते हैं।

वह सोफा, जिस पर बैठते थे भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी

मेरे निवास की स्मृतियों में उस सोफे का विशेष स्थान है, जिस पर आदरणीय श्री रामनाथ कोविंद जी कई बार बैठा करते थे।

भाजपा में संगठनात्मक दायित्वों के निर्वहन के दौरान मुझे उनके साथ कार्य करने और कई अवसरों पर साथ प्रवास करने का अवसर मिला। उस समय वे भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी थे। संगठनात्मक कार्यों के कारण हमारा नियमित संपर्क रहता था।

वे जब भी मेरे निवास पर आते, तो इसी सोफे पर बैठा करते थे। जब मैंने उनसे इस सोफे का उल्लेख करते हुए उससे जुड़ी अपनी भावनाएँ साझा कीं, तो उन्होंने सहजता और सकारात्मक भाव से उस पर बैठना स्वीकार किया। इसके बाद भी जब वे मेरे निवास पर आते, तो इस सोफे पर बैठने की बात करते थे।

धीरे-धीरे यह सोफा मेरे लिए केवल एक फर्नीचर नहीं रहा, बल्कि उनके साथ बिताए आत्मीय क्षणों और संगठनात्मक जीवन की यादों का प्रतीक बन गया।

वर्ष 2015 में आदरणीय रामनाथ कोविंद जी बिहार के राज्यपाल बने और वर्ष 2017 में भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। उनके इस गौरवपूर्ण सफर को देखकर मेरे मन में उन पुराने दिनों की स्मृतियाँ ताजा हो उठीं, जब वे मेरे निवास पर सहज भाव से बैठकर संगठनात्मक विषयों पर चर्चा किया करते थे।

मेरे लिए यह गर्व और प्रसन्नता का विषय रहा कि जिस व्यक्तित्व के साथ मुझे संगठन में कार्य करने और आत्मीय समय बिताने का अवसर मिला, वह आगे चलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचा।

आज भी जब मैं उस सोफे को देखता हूँ, तो उनके साथ बिताए वे क्षण स्मरण हो आते हैं। यह स्मृति मुझे बताती है कि जीवन में कुछ वस्तुओं का महत्व उनके भौतिक मूल्य से नहीं, बल्कि उनसे जुड़े संबंधों और अनुभवों से निर्धारित होता है।

आदरणीय डॉ. इंद्रेश कुमार जी के तीन प्रवास और संघ कार्य की स्मृतियाँ

मेरे निवास की स्मृतियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक आदरणीय डॉ. इंद्रेश कुमार जी का भी विशेष स्थान है।

उनका मेरे निवास पर तीन बार प्रवास हुआ। इन प्रवासों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण स्मृति यह है कि इसी सोफे पर बैठकर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को बैठक के लिए आमंत्रित किया था।

मेरे लिए वह केवल एक बैठक का प्रसंग नहीं था, बल्कि संगठनात्मक जीवन, विचार-विमर्श और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का आत्मीय क्षण था।

उनका मेरे निवास पर आना और वहाँ बैठकर स्वयंसेवकों के साथ संवाद करना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य का विषय रहा। इन अवसरों ने मुझे यह अनुभव कराया कि संगठन की शक्ति केवल बड़े कार्यालयों या सार्वजनिक मंचों में नहीं होती, बल्कि उन स्थानों में भी होती है, जहाँ कार्यकर्ता और मार्गदर्शक साथ बैठते हैं, विचार साझा करते हैं और समाज तथा राष्ट्र के लिए कार्य करने का संकल्प लेते हैं।

आज भी उस सोफे को देखकर डॉ. इंद्रेश कुमार जी के प्रवास और उनसे जुड़ी संगठनात्मक गतिविधियों की स्मृतियाँ मन में ताजा हो जाती हैं।

मेरे निवास पर गुरु दक्षिणा कार्यक्रम और अंबेडकर शाखा के स्वयंसेवक

मेरे सार्वजनिक और संगठनात्मक जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण अध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा गतिविधियों और गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों से जुड़ा है।

मेरे निवास पर कई बार गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। उन अवसरों पर क्षेत्र की अंबेडकर शाखा के अनेक स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा अर्पित करने के लिए मेरे निवास पर आया करते थे।

उन दिनों घर का वातावरण आत्मीयता, अनुशासन और संगठनात्मक भावना से भर जाता था। स्वयंसेवकों का एकत्र होना, परंपरा के अनुसार गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में सहभागिता करना और संगठन के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त करना मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभव रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरा में भगवा ध्वज को गुरु मानकर गुरु दक्षिणा अर्पित की जाती है। यह परंपरा श्रद्धा, त्याग, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण के भाव को अभिव्यक्त करती है।

मेरे निवास पर आयोजित ये कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहाँ घर की निजी सीमाओं से आगे बढ़कर संगठन के स्वयंसेवकों के साथ सामूहिक सहभागिता और वैचारिक जुड़ाव का अवसर मिलता था।

आज उन दिनों को याद करता हूँ, तो मन में विशेष संतोष होता है। अंबेडकर शाखा के स्वयंसेवकों का मेरे निवास पर एकत्र होना और गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों में सहभागिता करना मेरे जीवन की ऐसी स्मृतियाँ हैं, जिन्हें मैं हमेशा सम्मान के साथ संजोकर रखना चाहूँगा।

मेरे लिए ये केवल पुराने कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस दौर के जीवंत दस्तावेज हैं, जब मेरा निवास संगठनात्मक गतिविधियों और आत्मीय संवाद का केंद्र बना करता था।

वह कुर्सी, जिस पर बैठकर आदरणीय थावरचंद गहलोत जी एवं आदरणीय दुष्यंत कुमार गौतम जी ने बिताए आत्मीय पल

मेरे निवास की एक अन्य कुर्सी भी अनेक महत्वपूर्ण मुलाकातों की साक्षी रही है।

वर्ष 2010 में आदरणीय श्री रामनाथ कोविंद जी, भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव श्री थावरचंद गहलोत जी और श्री दुष्यंत गौतम जी मेरे निवास पर आए थे। उस अवसर पर आदरणीय रामनाथ कोविंद जी ने श्री थावरचंद गहलोत जी को उस कुर्सी पर बैठाया।

उस समय कुर्सी को लेकर हुई आत्मीय बातचीत और उसके प्रति व्यक्त सकारात्मक भाव आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं। आदरणीय रामनाथ कोविंद जी ने उस कुर्सी के संबंध में यह भाव व्यक्त किया था कि इसमें शक्ति है।

उस समय यह बात सहज बातचीत का हिस्सा थी, लेकिन बाद के वर्षों में इन व्यक्तित्वों की सार्वजनिक जीवन में उपलब्धियों को देखते हुए यह प्रसंग मेरी स्मृतियों में और भी विशेष बन गया।

वर्ष 2014 में श्री थावरचंद गहलोत जी भारत सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। आगे चलकर उन्होंने कर्नाटक के राज्यपाल का दायित्व भी संभाला।

आदरणीय श्री दुष्यंत गौतम जी से भी मेरे लंबे समय से संगठनात्मक संबंध रहे हैं। वे मेरे निवास पर कई बार आए और उनके साथ भी अनेक आत्मीय क्षण बिताने का अवसर मिला। उनके सार्वजनिक जीवन की यात्रा और महत्वपूर्ण दायित्वों को देखकर मुझे पुराने संगठनात्मक दिनों की याद आती है।

मेरे लिए इस कुर्सी का महत्व किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास के कारण नहीं, बल्कि उन व्यक्तित्वों के साथ जुड़ी स्मृतियों के कारण है, जिन्होंने यहाँ बैठकर आत्मीयता के साथ समय बिताया। कभी-कभी जीवन की साधारण वस्तुएँ भी असाधारण बन जाती हैं, क्योंकि उनसे जुड़ी यादें असाधारण होती हैं।

वर्ष 2007 का चुनाव और आज के कैबिनेट मंत्री श्री सुनील शर्मा

वर्ष 2007 में गाजियाबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी श्री सुनील शर्मा जी थे। चुनाव प्रचार के दौरान वे भी मेरे निवास पर आयोजित बैठकों में उपस्थित रहे।

उस समय चुनावी गतिविधियों के बीच कार्यकर्ताओं का जुटना, विचार-विमर्श करना और संगठन के लिए मिलकर काम करना सामान्य बात थी। आज श्री सुनील शर्मा जी को उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के दायित्व में देखकर मुझे उन दिनों की याद आती है, जब वे चुनाव प्रचार के सिलसिले में मेरे निवास पर बैठकों में शामिल हुआ करते थे।

राजनीतिक जीवन की यही विशेषता है कि समय के साथ पद और जिम्मेदारियाँ बदलती हैं, लेकिन पुराने संबंधों और संघर्ष के दिनों की स्मृतियों का महत्व बना रहता है।

आदरणीय श्री विद्यासागर सोनकर जी और अन्य वरिष्ठ नेताओं की स्मृतियाँ

मेरे निवास पर आदरणीय श्री विद्यासागर सोनकर जी का भी आगमन हुआ था। उस समय वे पूर्व सांसद थे। बाद में वे राज्यसभा के सदस्य बने।

इनके अतिरिक्त भी मेरे निवास पर अनेक वरिष्ठ नेताओं, राष्ट्रीय पदाधिकारियों और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों का आगमन हुआ है। हर मुलाकात की अपनी कहानी है और हर कहानी मेरे सार्वजनिक तथा संगठनात्मक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इन सभी अनुभवों ने मुझे यह समझने का अवसर दिया कि संगठनात्मक जीवन में संबंधों का महत्व पदों से कहीं अधिक स्थायी होता है। पद बदल सकते हैं, जिम्मेदारियाँ बदल सकती हैं, लेकिन आत्मीयता और साझा अनुभव लंबे समय तक स्मृतियों में जीवित रहते हैं।

मेरा निवास, मेरे परिवार और मेरे सार्वजनिक जीवन की साझा धरोहर

जब मैं इन सभी प्रसंगों को एक साथ याद करता हूँ, तो मन में अपने परिवार के प्रति भी कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।

मेरा निवास केवल मेरा निजी स्थान नहीं, बल्कि मेरे परिवार के जीवन का केंद्र भी है। यहाँ आने वाले अतिथियों का स्वागत करना, उनके साथ समय बिताना और उनके विचार सुनना हमारे जीवन का हिस्सा रहा है।

मेरे परिवार के लिए यह गौरव का विषय है कि इस घर में ऐसे अनेक व्यक्तित्व आए, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं और देश के सार्वजनिक जीवन में योगदान दिया।

मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि कौन कितने बड़े पद पर पहुँचा, बल्कि यह है कि मुझे ऐसे लोगों के साथ काम करने, उनसे सीखने और उनके साथ आत्मीय संबंध बनाए रखने का अवसर मिला।

आज मेरे निवास का यह सोफा और यह कुर्सी मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब यहाँ चुनावी बैठकों की गहमागहमी हुआ करती थी, वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श होता था, संघ के स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों के लिए एकत्र होते थे और राष्ट्र तथा समाज के लिए कार्य करने की भावना को बल मिलता था।

इन स्मृतियों में राजनीतिक जीवन भी है, संगठनात्मक अनुशासन भी, आत्मीय संबंध भी और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण भी।

नई पीढ़ी के लिए मेरा संदेश

अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभवों से मैं नई पीढ़ी को यही संदेश देना चाहता हूँ कि अपने कार्य, व्यवहार और संबंधों को सदैव महत्व दें।

जब आप संगठन, समाज या राष्ट्र के लिए ईमानदारी से काम करते हैं, तो अनेक लोगों के साथ आपका जुड़ाव बनता है। समय के साथ वही जुड़ाव आपके जीवन की अनमोल पूँजी बन जाता है।

जिन व्यक्तित्वों को हम आज बड़े संवैधानिक और राजनीतिक पदों पर देखते हैं, वे भी अपनी यात्रा के दौरान कार्यकर्ताओं, सहयोगियों और आम लोगों के बीच बैठते रहे हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के वर्तमान पद से अधिक महत्व उसके व्यवहार, विचार और समाज के प्रति योगदान का होना चाहिए।

मेरे निवास का यह सोफा और यह कुर्सी मेरे लिए इसी सीख के प्रतीक हैं। इनके साथ जुड़ी स्मृतियाँ मुझे याद दिलाती हैं कि जीवन की असली संपत्ति केवल धन या भौतिक वस्तुएँ नहीं, बल्कि अच्छे संबंध, साझा संघर्ष, विश्वास और समय के साथ संजोई गई यादें हैं।

आज जब मैं इन स्थानों को देखता हूँ, तो मन गर्व और कृतज्ञता से भर जाता है। यहाँ चुनावी बैठकों की गहमागहमी रही, संगठनात्मक चर्चाएँ हुईं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों में सहभागिता की और अनेक आत्मीय क्षणों ने मेरे जीवन को समृद्ध किया।

मेरे लिए यह निवास, यह सोफा और यह कुर्सी केवल घर की वस्तुएँ नहीं हैं। ये मेरे सार्वजनिक जीवन की यात्रा, संगठन के प्रति समर्पण और उन महान विभूतियों के साथ बने आत्मीय संबंधों की जीवंत स्मृतियाँ हैं।

मैं ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उसने मुझे ऐसे लोगों के साथ कार्य करने, उनसे सीखने और अपने जीवन में इन अविस्मरणीय क्षणों को संजोने का अवसर दिया।

क्योंकि अंततः जीवन की सबसे मूल्यवान धरोहर वे स्मृतियाँ हैं, जिन्हें हम समय बीत जाने के बाद भी सम्मान, आत्मीयता और गर्व के साथ याद करते हैं।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भाजपा नेता एवं पूर्व राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा

Friday, October 16, 2026

I Have Worked with Dushyant Gautam Ji for Years and Know His Character and Ideology Through Personal Experience: Shant Prakash Jatav


I Have Worked with Dushyant Gautam Ji for Years and Know His Character and Ideology Through Personal Experience: Shant Prakash Jatav

The Ankita Bhandari case should not be reduced to political allegations and counter-allegations. Facts, evidence, and due respect for the judicial process must remain paramount.

I, Shant Prakash Jatav, BJP leader and National President of the Bharatiya Janata Mazdoor Sangh, have worked alongside senior BJP leader Shri Dushyant Gautam Ji for many years. During our long association in organizational work, I had the opportunity to observe his personality, working style, ideology, and outlook towards society at close quarters.

Based on my personal experience, I would like to state that I have never seen Dushyant Gautam Ji making remarks or displaying behaviour that reflected disrespect towards women or an inappropriate attitude towards daughters. On the contrary, I have observed in him a positive outlook towards society, a concern for social issues, and an emphasis on the dignity and respect of daughters.

For him, respect for daughters is not merely a matter of words; it has been an important aspect of his working style and social conduct. In my personal experience, his behaviour has reflected values that can serve as a positive example for society. I am making this statement not on the basis of hearsay, but on the strength of my own experience of working with him for years and observing him closely.

The Ankita Bhandari case is an extremely sensitive matter. Ankita was a daughter of Uttarakhand, and ensuring justice for her is a collective responsibility. Her memory, the sentiments of her family, and the broader concerns surrounding women's safety must not be confined to political accusations and counter-accusations. If any allegations or evidence emerge against any individual, they must be investigated impartially, and the matter must be decided in accordance with the law.

However, it is equally inappropriate to link a sensitive case to a political leader and present allegations as established facts without substantiation. Any conclusion regarding Shri Dushyant Gautam Ji must be based on facts, evidence, and due legal process. I consider it my responsibility to publicly clarify the opinion I have formed about his character and conduct towards women through my years of personal association with him.

I would also like to point out that Shri Dushyant Gautam Ji belongs to the Scheduled Caste community and is a senior figure in public life. It is inappropriate to use any individual's social identity as a political weapon. Protecting the dignity, equality, and constitutional rights of the Scheduled Caste community does not mean opposing the investigation of allegations. Rather, it means ensuring that every individual is treated fairly and equally under the law.

Shri Dushyant Gautam Ji's appointment as the Governor of Sikkim is a constitutional appointment. Any claim seeking to link this appointment to another case must be assessed on the basis of evidence rather than political perceptions.

My clear position is that demanding justice for Ankita Bhandari and presenting Shri Dushyant Gautam Ji's side based on my personal experience are not mutually exclusive. Every citizen has the right to demand justice, but it is equally important to exercise fairness and consider the facts before drawing conclusions about an individual's character.

I appeal to all political parties to exercise restraint on this sensitive issue, maintain respect for Ankita Bhandari and her family, and refrain from declaring anyone guilty without evidence.

I have worked with Dushyant Gautam Ji for many years. Based on my personal experience of observing his personality and conduct at close quarters, I am expressing my views with complete clarity and a sense of responsibility. I firmly believe that individuals in public life should be assessed not on the basis of political allegations, but on the basis of facts, conduct, and evidence.

Shant Prakash Jatav
National President
Bharatiya Janata Mazdoor Sangh
BJP Leader

Friday, June 26, 2026

आपातकाल (1975–77) और रायबरेली प्रकरण: भारतीय लोकतंत्र का निर्णायक अध्याय


एक ऐतिहासिक और संतुलित विश्लेषण

लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS)


प्रस्तावना

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास अनेक महत्वपूर्ण मोड़ों से भरा हुआ है, लेकिन 1975 से 1977 का आपातकाल कालखंड उन घटनाओं में से एक है जिसने देश की राजनीतिक, संवैधानिक और सामाजिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया।

इस अवधि को समझने के लिए केवल आपातकाल की घोषणा नहीं, बल्कि उसके पीछे की घटनाओं—विशेषकर रायबरेली चुनाव प्रकरण और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय—को भी समझना आवश्यक है।


रायबरेली चुनाव प्रकरण: पृष्ठभूमि

1971 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से विजय प्राप्त की थी। उनके प्रतिद्वंदी राज नारायण ने चुनाव परिणाम को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

उनका आरोप था कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी संसाधनों और अधिकारियों के उपयोग सहित कुछ प्रक्रियात्मक अनियमितताएँ हुईं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई।


इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय (12 जून 1975)

न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा दिए गए इस निर्णय में अदालत ने पाया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के कुछ प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।

विशेष रूप से यह माना गया कि चुनाव प्रचार में एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका रही जो उस समय सरकारी सेवा से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं माना जा सकता था।

इस आधार पर अदालत ने निर्णय दिया कि:

  • इंदिरा गांधी का रायबरेली निर्वाचन निरस्त किया जाता है
  • उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त की जाती है
  • उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है

यह स्वतंत्र भारत में पहली बार था जब किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव न्यायालय द्वारा रद्द किया गया।


संवैधानिक दृष्टिकोण

यह समझना आवश्यक है कि भारत में प्रधानमंत्री का पद किसी एक निर्वाचन क्षेत्र पर आधारित नहीं होता, बल्कि वह लोकसभा में बहुमत के समर्थन से निर्धारित होता है।

इसलिए रायबरेली सीट का निरस्त होना स्वयं में केंद्र सरकार की संवैधानिक वैधता को स्वतः समाप्त नहीं करता था।

फिर भी, इस निर्णय ने उस समय एक गंभीर राजनीतिक और नैतिक बहस को जन्म दिया।


सुप्रीम कोर्ट में अपील और राजनीतिक तनाव

इंदिरा गांधी ने इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।
24 जून 1975 को न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर द्वारा अंतरिम राहत दी गई, जिससे उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति मिली।

इसी समय देश में:

  • महंगाई और आर्थिक असंतोष
  • छात्र आंदोलन
  • “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन (जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में)
  • विपक्ष की एकजुटता

जैसी परिस्थितियाँ तेजी से उभर रही थीं।


25 जून 1975: आपातकाल की घोषणा

इन्हीं परिस्थितियों के बीच 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित किया गया।

सरकार ने इसे “आंतरिक अशांति” के आधार पर उचित ठहराया।


आपातकाल के प्रमुख प्रभाव

1. मौलिक अधिकारों पर प्रभाव

  • अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर गंभीर प्रतिबंध
  • प्रेस सेंसरशिप लागू
  • कई नागरिक स्वतंत्रताओं का निलंबन

2. प्रेस और मीडिया

  • समाचार प्रकाशन से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक
  • आलोचनात्मक पत्रकारिता पर नियंत्रण
  • कई पत्रकारों और संपादकों पर कार्रवाई

3. राजनीतिक गिरफ्तारियाँ

  • प्रमुख विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी
  • जनआंदोलनों पर प्रतिबंध

4. प्रशासनिक सख्ती

  • दिल्ली सहित कई शहरों में झुग्गी हटाओ अभियान
  • परिवार नियोजन कार्यक्रम का आक्रामक क्रियान्वयन

न्यायपालिका की भूमिका

आपातकाल के दौरान न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत चर्चित रही। विशेष रूप से ADM Jabalpur बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) का निर्णय विवादास्पद माना गया, जिसमें आपातकाल के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीमाएँ स्वीकार की गईं।

बाद में इस निर्णय की व्यापक आलोचना हुई और इसे भारतीय न्यायिक इतिहास का एक विवादित अध्याय माना जाता है।


42वाँ संविधान संशोधन (1976)

इस अवधि में संविधान में बड़े बदलाव किए गए, जिनमें शामिल थे:

  • प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्दों का समावेश
  • केंद्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि
  • संविधान संशोधन प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाना
  • संसद की भूमिका को मजबूत करना

आपातकाल की समाप्ति और 1977 का चुनाव

जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा हुई।
मार्च 1977 में हुए चुनावों में जनता ने परिवर्तन का स्पष्ट संकेत दिया।

  • जनता पार्टी की ऐतिहासिक विजय
  • केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन (मोरारजी देसाई)
  • 21 मार्च 1977 को आपातकाल की समाप्ति

निष्कर्ष

1975–77 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का ऐसा अध्याय है जिसने यह स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ, न्यायपालिका, प्रेस और नागरिक अधिकार किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होते हैं।

रायबरेली चुनाव प्रकरण इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण तात्कालिक कारण बना, जबकि वास्तविक स्थिति कई राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हुई थी।

यह कालखंड आज भी अध्ययन का विषय है क्योंकि इससे यह संदेश मिलता है कि लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं चलता, बल्कि उसकी आत्मा जनता की स्वतंत्रता और संस्थाओं की संतुलित शक्ति में निहित होती है।


लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS)

Wednesday, June 24, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS): पंजीकरण, संविधान, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम और शाखा व्यवस्था का तथ्यात्मक अध्ययन


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS): पंजीकरण, संविधान, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम और शाखा व्यवस्था का तथ्यात्मक अध्ययन

लेखक: शांत प्रकाश जाटव

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में की गई थी। लगभग एक शताब्दी के इतिहास वाले इस संगठन ने भारतीय समाज, संस्कृति, शिक्षा, सेवा और राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। संघ को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों प्रकार के विचार मौजूद हैं, किंतु किसी भी संगठन को समझने का सर्वोत्तम तरीका उसके घोषित उद्देश्यों, संविधान, कार्यप्रणाली और संगठनात्मक व्यवस्था का अध्ययन करना है।

यह लेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीकरण, संविधान, सदस्यता व्यवस्था, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम तथा शाखा व्यवस्था का तथ्यात्मक परिचय प्रस्तुत करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। संघ का उद्देश्य समाज में संगठन, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना बताया जाता है।

आज RSS भारत के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है और इसकी शाखाएँ देश के हजारों नगरों, कस्बों और गाँवों में संचालित होती हैं।

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत संस्था है?

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है।

यह तथ्य समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा का विषय रहा है। हालांकि भारतीय कानून में प्रत्येक सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। अतः केवल पंजीकरण का अभाव किसी संगठन को स्वतः अवैध नहीं बनाता।

पंजीकरण के सामान्य लाभ होते हैं, जैसे:

  • स्वतंत्र कानूनी पहचान,
  • संपत्ति का स्वामित्व,
  • बैंक खाते संचालित करने की सुविधा,
  • अनुबंध करने की क्षमता,
  • न्यायालय में संगठन के नाम से कार्यवाही।

इसके बावजूद भारत में अनेक प्रकार के स्वैच्छिक संगठन बिना औपचारिक पंजीकरण के भी कार्य कर सकते हैं, यदि वे कानून का पालन कर रहे हों।

RSS का लिखित संविधान

कई लोगों में यह भ्रम पाया जाता है कि RSS का कोई संविधान नहीं है। वास्तव में यह धारणा सही नहीं है।

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद हुई प्रक्रियाओं के दौरान 1949 में संघ ने एक लिखित संविधान स्वीकार किया। आज संघ की संगठनात्मक संरचना और कार्यप्रणाली इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होती है।

RSS के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

1. संगठन का उद्देश्य

RSS के संविधान के अनुसार संगठन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना तथा राष्ट्र जीवन को सुदृढ़ बनाना है।

संघ के समर्थकों का मानना है कि "हिंदू समाज का संगठन" केवल धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास है।

2. स्वयंसेवक व्यवस्था

संघ में कार्य करने वाले व्यक्ति को "स्वयंसेवक" कहा जाता है। स्वयंसेवक संघ की मूल शक्ति माने जाते हैं।

3. सदस्यता प्रणाली

संघ की सदस्यता व्यवस्था अन्य संगठनों से भिन्न है।

सामान्यतः:

  • सदस्यता फॉर्म नहीं भरा जाता,
  • सदस्यता कार्ड जारी नहीं किया जाता,
  • प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता।

व्यक्ति शाखा में भाग लेकर स्वयंसेवक के रूप में जुड़ता है।

4. सरसंघचालक

सरसंघचालक संघ का सर्वोच्च पद माना जाता है। वह संगठन का वैचारिक मार्गदर्शन करता है।

5. सरकार्यवाह

सरकार्यवाह संघ का प्रमुख कार्यकारी पदाधिकारी होता है और संगठन के दैनिक प्रशासनिक एवं संगठनात्मक कार्यों का संचालन करता है।

6. अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) संघ की सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था मानी जाती है। संगठन के महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय इसी मंच पर लिए जाते हैं।

स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया

चूंकि संघ में औपचारिक सदस्यता कार्ड की व्यवस्था नहीं है, इसलिए स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया पारंपरिक राजनीतिक दलों से भिन्न है।

संघ की परंपरा में सामान्यतः माना जाता है कि जिस दिन कोई व्यक्ति पहली बार शाखा में उपस्थित होकर भगवा ध्वज को प्रणाम करता है और शाखा की गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ करता है, उसी दिन से उसका स्वयंसेवक जीवन प्रारंभ माना जा सकता है।

हालांकि इसे औपचारिक सदस्यता प्रमाणपत्र के समान नहीं माना जाता।

RSS का भगवा ध्वज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्वज भगवा ध्वज है।

यह साधारण भगवा रंग का ध्वज होता है, जिस पर सामान्यतः कोई चिन्ह अंकित नहीं होता।

संघ की दृष्टि में भगवा ध्वज प्रतीक है:

  • त्याग का,
  • तपस्या का,
  • बलिदान का,
  • आत्मसंयम का,
  • राष्ट्र समर्पण का।

संघ में भगवा ध्वज को गुरु का स्थान 

RSS की एक विशिष्ट परंपरा यह है कि वह किसी व्यक्ति को सर्वोच्च स्थान देने के बजाय भगवा ध्वज को "गुरु" का स्थान देता है।

संघ का मानना है कि व्यक्ति सीमित हो सकता है, जबकि आदर्श शाश्वत होते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति विशेष के बजाय आदर्शों के प्रतीक ध्वज को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है।

ध्वज प्रणाम का महत्व

संघ की शाखा में स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष ध्वज प्रणाम करते हैं।

संघ के अनुसार ध्वज प्रणाम:

  • किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है,
  • बल्कि आदर्शों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है।

ध्वज प्रणाम के माध्यम से स्वयंसेवक:

  • अनुशासन,
  • त्याग,
  • समर्पण,
  • राष्ट्रसेवा

की भावना व्यक्त करते हैं।

गुरु दक्षिणा की परंपरा

संघ में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर "गुरु दक्षिणा" कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

इस अवसर पर:

  • भगवा ध्वज को गुरु मानकर प्रणाम किया जाता है,
  • स्वयंसेवक स्वैच्छिक आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं,
  • संगठन के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हैं।

शाखा: संघ की मूल इकाई

RSS की सबसे महत्वपूर्ण इकाई शाखा मानी जाती है।

देशभर में हजारों स्थानों पर नियमित शाखाएँ आयोजित की जाती हैं। शाखा सामान्यतः लगभग एक घंटे की होती है।

संघ के अनुसार शाखा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रसेवा की भावना का विकास करना है।

शाखा में क्या-क्या होता है?

1. ध्वज एवं प्रारंभ

शाखा की शुरुआत भगवा ध्वज के समक्ष अनुशासित रूप से एकत्र होकर की जाती है।

2. ध्वज प्रणाम

स्वयंसेवक ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।

3. शारीरिक व्यायाम

शाखा में निम्न गतिविधियाँ हो सकती हैं:

  • योग,
  • सूर्य नमस्कार,
  • दौड़,
  • दंड (लाठी) अभ्यास,
  • सामूहिक व्यायाम।

इनका उद्देश्य शारीरिक क्षमता और अनुशासन का विकास करना बताया जाता है।

4. खेलकूद

शाखाओं में विभिन्न खेल आयोजित किए जाते हैं, जैसे:

  • कबड्डी,
  • खो-खो,
  • दौड़ प्रतियोगिताएँ,
  • समूह आधारित खेल।

इनका उद्देश्य सामूहिकता और टीम भावना विकसित करना होता है।

5. शारीरिक प्रशिक्षण

स्वयंसेवकों को:

  • अनुशासन,
  • समन्वय,
  • नेतृत्व,
  • आत्मविश्वास

का अभ्यास कराया जाता है।

6. बौद्धिक वर्ग

शाखा का एक महत्वपूर्ण भाग बौद्धिक चर्चा होती है।

इन चर्चाओं में विषय हो सकते हैं:

  • भारतीय इतिहास,
  • सामाजिक प्रश्न,
  • राष्ट्रीय घटनाक्रम,
  • महापुरुषों का जीवन,
  • सांस्कृतिक परंपराएँ।

7. संगठनात्मक चर्चा

इस दौरान आगामी कार्यक्रमों, सेवा गतिविधियों और सामाजिक अभियानों की जानकारी दी जाती है।

8. संघ प्रार्थना

शाखा का समापन संघ प्रार्थना के साथ किया जाता है।

एक सामान्य शाखा का समय विभाजन

गतिविधि अनुमानित समय
ध्वज एवं प्रारंभ 5 मिनट
व्यायाम एवं शारीरिक गतिविधियाँ 15–20 मिनट
खेलकूद 15–20 मिनट
बौद्धिक चर्चा 10–15 मिनट
प्रार्थना एवं समापन 5 मिनट

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत नहीं है, लेकिन इसका अपना लिखित संविधान, संगठनात्मक ढांचा और निर्धारित कार्यप्रणाली है।

संघ की पहचान उसकी शाखा व्यवस्था, स्वयंसेवक परंपरा, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम, गुरु दक्षिणा, संगठनात्मक अनुशासन और समाज संगठन की अवधारणा से जुड़ी हुई है।

संघ के संविधान के अनुसार उसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना और राष्ट्र जीवन को सुदृढ़ बनाना है, जबकि उसके समर्थक इसे भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना को संगठित और सशक्त बनाने का प्रयास मानते हैं।

किसी भी संगठन के बारे में मत बनाने से पहले उसके घोषित सिद्धांतों, संरचना और कार्यप्रणाली को तथ्यात्मक रूप से समझना लोकतांत्रिक विमर्श की दृष्टि से आवश्यक है।


लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भारतीय जनता पार्टी नेता

Monday, June 22, 2026

योग: साधना, विज्ञान और भारत की वैश्विक सांस्कृतिक विजय



लेखक: शांत प्रकाश जाटव

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को लेकर कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूह यह प्रचारित करते हैं कि योग का वैश्विक विस्तार केवल एक "पीआर अभियान" या "सरकारी तमाशा" है। यह दृष्टिकोण न केवल अधूरा है, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और उसकी आधुनिक वैश्विक उपलब्धियों को भी नजरअंदाज करता है।

सच्चाई यह है कि योग भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा की अमूल्य धरोहर है। महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित स्वरूप दिया, जबकि आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, बी.के.एस. अयंगर, परमहंस योगानंद और अनेक योगाचार्यों ने इसे विश्व तक पहुंचाया। स्वतंत्र भारत में विभिन्न सरकारों ने योग के विकास में योगदान दिया, लेकिन 21वीं सदी में योग को वैश्विक जनआंदोलन बनाने का कार्य अभूतपूर्व स्तर पर हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की ऐतिहासिक जीत

27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा। मात्र 75 दिनों के भीतर 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 177 देशों के समर्थन से 21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में किसी सांस्कृतिक प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में देशों का समर्थन मिलना एक असाधारण उपलब्धि थी। आज विश्व के 190 से अधिक देशों में योग दिवस आयोजित किया जाता है और करोड़ों लोग इसमें भाग लेते हैं।

क्या योग केवल एक कार्यक्रम है?

योग को केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित करके देखना गलत है। योग आज भारत के स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सेना, पुलिस, खेल संस्थानों, कॉरपोरेट जगत और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच चुका है।

भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार देशभर में हजारों योग प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए गए हैं। लाखों लोगों ने योग प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया है। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (MDNIY) और केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (CCRYN) जैसे संस्थान योग के वैज्ञानिक अध्ययन और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार

योग के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि सरकार केवल योग का प्रचार करती है और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं देती। लेकिन आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर पेश करते हैं।

AIIMS का विस्तार

2014 तक देश में केवल 7 AIIMS कार्यरत थे। आज 22 से अधिक AIIMS कार्यरत या शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल हैं, जबकि कई अन्य विभिन्न चरणों में हैं।

मेडिकल कॉलेजों में वृद्धि

  • वर्ष 2014 में देश में लगभग 387 मेडिकल कॉलेज थे।
  • वर्ष 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 780 से अधिक हो चुकी है।

अर्थात मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।

MBBS सीटों में वृद्धि

  • 2014 में लगभग 51,000 MBBS सीटें थीं।
  • 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1.18 लाख से अधिक हो गई।

यानी 130% से अधिक वृद्धि।

PG मेडिकल सीटों में वृद्धि

  • 2014 में लगभग 31,000 PG सीटें थीं।
  • आज यह संख्या 74,000 से अधिक है।

आयुष्मान भारत

आयुष्मान भारत योजना के तहत लगभग 12 करोड़ परिवारों को प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक की स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की गई है। करोड़ों मरीज इस योजना का लाभ प्राप्त कर चुके हैं।

स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र

देशभर में 1.75 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (पूर्व स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र) स्थापित किए गए हैं, जिनके माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं गांव-गांव तक पहुंच रही हैं।

योग और वैज्ञानिक अनुसंधान

कुछ लोग दावा करते हैं कि पूर्व में योग पर वैज्ञानिक अनुसंधान होता था जबकि आज केवल प्रचार हो रहा है। वास्तविकता यह है कि आज योग अनुसंधान पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक स्तर पर हो रहा है।

प्रमुख संस्थान

  • मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (नई दिल्ली)
  • केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (CCRYN)
  • अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विभिन्न शोध विभाग
  • आयुष मंत्रालय के अधीन अनेक अनुसंधान परियोजनाएं

आज मधुमेह, उच्च रक्तचाप, तनाव, अवसाद, मोटापा, अनिद्रा और जीवनशैली संबंधी रोगों पर योग आधारित अनुसंधान देश और विदेश में चल रहे हैं।

योग ने रोजगार के नए अवसर दिए

योग का वैश्विक विस्तार केवल सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं बल्कि आर्थिक अवसर भी है।

भारत का वेलनेस और योग उद्योग अरबों डॉलर का क्षेत्र बन चुका है। आज हजारों योग प्रशिक्षक, आयुष चिकित्सक, प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ, फिटनेस कोच और वेलनेस सलाहकार इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।

विश्व के अनेक देशों में भारतीय योग प्रशिक्षकों की मांग बढ़ी है। योग पर्यटन, वेलनेस रिट्रीट और आयुष आधारित सेवाओं ने लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराया है।

योग और भारत की सॉफ्ट पावर

दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी संस्कृति के माध्यम से प्रभाव बढ़ाते हैं।

  • अमेरिका हॉलीवुड और अंग्रेजी भाषा के माध्यम से।
  • चीन कन्फ्यूशियस संस्थानों के माध्यम से।
  • फ्रांस अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से।

भारत ने योग के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर स्थापित किया है। आज जब न्यूयॉर्क, पेरिस, लंदन, टोक्यो, मॉस्को, सिडनी और दुबई में लाखों लोग योग करते हैं तो यह केवल स्वास्थ्य गतिविधि नहीं बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन भी है।

योग किसी दल का नहीं, भारत का है

योग न कांग्रेस का है, न भाजपा का। योग न वामपंथ का है, न दक्षिणपंथ का। योग भारत की आत्मा का हिस्सा है।

नेहरू काल, इंदिरा गांधी काल, मोरारजी देसाई काल और बाद की विभिन्न सरकारों ने योग के विकास में योगदान दिया। उस योगदान का सम्मान होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि 2014 के बाद योग को जो वैश्विक पहचान मिली, वह भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

निष्कर्ष

यदि किसी नीति की सफलता का मापदंड केवल आलोचना हो, तो कोई भी उपलब्धि स्वीकार नहीं की जाएगी। लेकिन तथ्य बताते हैं कि आज योग विश्वव्यापी जनआंदोलन बन चुका है। स्वास्थ्य क्षेत्र में AIIMS, मेडिकल कॉलेजों, MBBS सीटों, आयुष्मान भारत और स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार हुआ है। योग अनुसंधान, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। भारत की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा विश्व मंच पर मजबूत हुई है।

इसलिए योग को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय भारत की सभ्यता, स्वास्थ्य और मानव कल्याण के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।

योग तमाशा नहीं, भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक है।
योग केवल आसन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, स्वास्थ्य और मानवता के कल्याण का मार्ग है।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस लागू कराने में नेतृत्व और विभागीय समन्वय: एक विश्लेषणात्मक दृष्टि

लेखक: शांत प्रकाश जाटव

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और संतुलन का प्रतीक बन चुका है। लेकिन इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रिया रही, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), विदेश मंत्रालय (MEA) और संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजनयिक तंत्र के बीच मजबूत समन्वय देखने को मिला।

1. प्रधानमंत्री स्तर पर पहल और राजनीतिक नेतृत्व

2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा। यह केवल एक सांस्कृतिक सुझाव नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित कूटनीतिक पहल थी।

कई सार्वजनिक बयानों और साक्षात्कारों में यह बात सामने आई है कि इस पहल को केवल “प्रस्ताव” के रूप में नहीं, बल्कि एक वैश्विक सहमति बनाने वाले अभियान के रूप में आगे बढ़ाया गया। प्रधानमंत्री स्तर पर इसकी लगातार निगरानी की गई और विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों से सीधे संवाद भी किया गया।

2. विदेश मंत्रालय (MEA) की भूमिका और कूटनीतिक समन्वय

इस प्रस्ताव को सफल बनाने में विदेश मंत्रालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। UN में भारत के स्थायी मिशन ने विभिन्न देशों के साथ लगातार बातचीत की और समर्थन जुटाया।

  • अफ्रीकी, एशियाई और यूरोपीय देशों से समर्थन जुटाने के लिए बहुपक्षीय वार्ताएँ की गईं
  • छोटे और विकासशील देशों को योग के स्वास्थ्य लाभों के बारे में विस्तार से समझाया गया
  • भारत ने इसे किसी धार्मिक या राजनीतिक विषय के बजाय “वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन” के रूप में प्रस्तुत किया

परिणामस्वरूप, 177 देशों ने इस प्रस्ताव का सह-प्रायोजन (co-sponsorship) किया, जो संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है।

3. विभागीय और संस्थागत समन्वय

इस पहल में केवल विदेश मंत्रालय ही नहीं, बल्कि कई अन्य संस्थानों का भी योगदान रहा:

  • आयुष मंत्रालय (AYUSH) ने योग के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रमाण प्रस्तुत किए
  • भारतीय सांस्कृतिक संस्थानों ने योग को सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रस्तुत किया
  • विभिन्न योग गुरुओं और संस्थानों से परामर्श लेकर एक वैश्विक रूपरेखा तैयार की गई

यह समन्वय इस बात का उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र, सांस्कृतिक संस्थान और राजनीतिक नेतृत्व मिलकर एक वैश्विक पहल को सफल बना सकते हैं।

4. नेतृत्व और विभागों के बीच संबंध की विशेषता

इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि नेतृत्व और विभागों के बीच स्पष्ट लक्ष्य और निरंतर संवाद था।

  • प्रधानमंत्री स्तर पर स्पष्ट विज़न दिया गया
  • मंत्रालयों को स्वतंत्र रूप से तकनीकी और कूटनीतिक रणनीति तैयार करने की छूट मिली
  • UN मिशन ने फील्ड स्तर पर लगातार संवाद और वार्ता को आगे बढ़ाया

कुछ पूर्व राजनयिकों और सरकारी अधिकारियों के इंटरव्यू और सार्वजनिक टिप्पणियों में यह संकेत मिलता है कि यह अभियान “शीर्ष नेतृत्व की दिशा और पेशेवर कूटनीतिक टीम की मेहनत” का संयुक्त परिणाम था।

5. निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक प्रस्ताव की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत की सॉफ्ट पावर, कूटनीतिक क्षमता और प्रशासनिक समन्वय का उदाहरण है। यह दिखाता है कि जब नेतृत्व स्पष्ट हो और विभागीय तंत्र समन्वित होकर काम करे, तो वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

योग दिवस आज दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत की प्राचीन परंपराएँ आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का समाधान बन सकती हैं।

— शांत प्रकाश जाटव


Sunday, June 21, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंजीकरण क्यों नहीं है? तथ्य, कानून और वास्तविकता



लेखक शांत प्रकाश जाटव

राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। संघ के लाखों स्वयंसेवक देशभर में विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक और सेवा गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद समय-समय पर एक प्रश्न चर्चा का विषय बनता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत संस्था है, और यदि नहीं, तो क्या इसका पंजीकरण होना आवश्यक है?

इस विषय पर अनेक प्रकार की धारणाएं प्रचलित हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रश्न को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तथ्य और कानून के आधार पर समझा जाए।

क्या भारत में हर संगठन का पंजीकरण अनिवार्य है?

भारतीय संविधान नागरिकों को संगठन बनाने और संचालित करने का अधिकार देता है। सामान्यतः किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन का अस्तित्व केवल इसलिए अवैध नहीं माना जाता क्योंकि उसका औपचारिक पंजीकरण नहीं है।

पंजीकरण कराने से संगठन को कई प्रशासनिक और कानूनी सुविधाएं मिलती हैं, जैसे:

  • अलग कानूनी पहचान,
  • संपत्ति का स्वामित्व,
  • बैंक खाते संचालित करने की सुविधा,
  • अनुबंध करने की क्षमता,
  • तथा न्यायालय में संगठन के नाम से कार्यवाही करने की सुविधा।

लेकिन प्रत्येक संगठन के लिए पंजीकरण हर स्थिति में अनिवार्य नहीं होता।

RSS की कानूनी स्थिति क्या है?

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि संघ बिना किसी संरचना के कार्य करता है। संघ का अपना लिखित संविधान है, जो उसकी कार्यप्रणाली, संगठनात्मक व्यवस्था और जिम्मेदारियों को निर्धारित करता है।

1949 में संघ ने लिखित संविधान क्यों अपनाया?

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद संघ और सरकार के बीच हुई प्रक्रियाओं के दौरान 1949 में संघ ने एक लिखित संविधान अपनाया।

प्रतिबंध हटने के बाद से संघ अपनी गतिविधियां इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित करता आ रहा है।

यदि RSS पंजीकृत नहीं है तो उसकी संपत्तियां और संस्थान कैसे संचालित होते हैं?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। वास्तविकता यह है कि संघ से संबंधित अनेक संस्थान, ट्रस्ट, समितियां, विद्यालय, प्रकाशन संस्थाएं और सेवा संगठन अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं।

इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से:

  • भूमि और भवनों का प्रबंधन,
  • बैंक खातों का संचालन,
  • वित्तीय लेन-देन,
  • दान का उपयोग,
  • तथा विभिन्न सामाजिक और सेवा परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।

अर्थात संगठनात्मक गतिविधियां और प्रशासनिक-वैधानिक व्यवस्थाएं अलग-अलग संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं।

क्या बिना पंजीकरण के संगठन चलाना गैरकानूनी है?

इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

भारतीय कानून में केवल पंजीकरण न होना किसी संगठन को स्वतः अवैध नहीं बनाता। किसी संगठन की वैधता का निर्धारण उसके कार्यों, कानून के पालन और संबंधित नियमों के अनुपालन के आधार पर किया जाता है।

इसलिए केवल इस आधार पर कि कोई संगठन पंजीकृत नहीं है, उसे गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

लोकतंत्र में प्रश्न पूछना भी आवश्यक है

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी बड़े संगठन, राजनीतिक दल, सामाजिक संस्था या वैचारिक संगठन के बारे में प्रश्न पूछना नागरिकों का अधिकार है। साथ ही तथ्यों के आधार पर उत्तर देना भी उतना ही आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति इस विषय पर अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, तो वह सार्वजनिक अभिलेखों, संबंधित विभागों के रिकॉर्ड तथा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के माध्यम से उपलब्ध सूचनाओं का अध्ययन कर सकता है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है, लेकिन इसका अपना लिखित संविधान और संगठनात्मक ढांचा है। संघ से संबंधित अनेक गतिविधियां विभिन्न पंजीकृत संस्थाओं और ट्रस्टों के माध्यम से संचालित होती हैं।

कानूनी दृष्टि से केवल पंजीकरण का अभाव किसी संगठन को अवैध नहीं बनाता। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय तथ्यों, कानून और उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों को आधार बनाना चाहिए, न कि केवल धारणाओं या राजनीतिक पूर्वाग्रहों को।


लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
नेता, भारतीय जनता पार्टी 

इंदिरा गांधी का दौर: क्या लोकतंत्र मजबूत हुआ या सत्ता का केंद्रीकरण?

कांग्रेस विभाजन, आपातकाल, दल-बदल और राज्य सरकारों की बर्खास्तगी का राजनीतिक विश्लेषण

लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ

नेता भारतीय जनता पार्टी

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1966 से 1984 तक का कालखंड अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में श्रीमती इंदिरा गांधी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेता के रूप में उभरीं। उनके समर्थक उन्हें दृढ़ निश्चयी और निर्णायक प्रधानमंत्री मानते हैं, जबकि उनके आलोचक इस दौर को लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का काल बताते हैं।

आज भी भारतीय राजनीति में जब आपातकाल, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति की चर्चा होती है, तो इंदिरा गांधी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

1966: सत्ता की शुरुआत

लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। प्रारंभ में उन्हें कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त था, लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका पार्टी के पुराने नेतृत्व से टकराव शुरू हो गया।

1967: कांग्रेस की कमजोरी और दल-बदल की राजनीति

1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। पहली बार कांग्रेस को यह एहसास हुआ कि उसका राजनीतिक वर्चस्व चुनौती के घेरे में है।

इसी समय हरियाणा में "आया राम, गया राम" राजनीति का जन्म हुआ। विधायक और सांसद लगातार दल बदल रहे थे। उस समय कोई दल-बदल विरोधी कानून नहीं था।

1969: कांग्रेस का विभाजन

1969 में कांग्रेस दो भागों में बंट गई—

  • कांग्रेस (ओ)
  • कांग्रेस (आर) (इंदिरा गांधी गुट)

यह केवल संगठनात्मक विभाजन नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व-आधारित राजनीति की शुरुआत का बड़ा मोड़ माना जाता है। कांग्रेस के अधिकांश सांसद इंदिरा गांधी के साथ चले गए और पार्टी पर उनका व्यक्तिगत नियंत्रण बढ़ता गया।

बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्ति

इंदिरा गांधी ने 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। 1971 में पूर्व रियासतों के राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को समाप्त किया गया।

इन कदमों ने उन्हें गरीबों और मध्यम वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया, लेकिन आलोचकों ने इसे राजनीतिक समर्थन जुटाने की रणनीति भी बताया।

1971: भारी जीत और बढ़ती शक्ति

"गरीबी हटाओ" नारे के साथ इंदिरा गांधी ने 1971 का चुनाव भारी बहुमत से जीता। उसी वर्ष भारत-पाक युद्ध में विजय और बांग्लादेश के निर्माण ने उनकी लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया।

लेकिन इसी के साथ सत्ता का केंद्रीकरण भी बढ़ने लगा।

अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग

इंदिरा गांधी के शासनकाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग हुआ।

हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, ओडिशा, नागालैंड और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

आलोचकों का आरोप था कि कई मामलों में यह कदम संवैधानिक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए।

1975: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय – आपातकाल

25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया।

आपातकाल के दौरान:

  • विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया।
  • प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई।
  • नागरिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया।
  • राजनीतिक विरोध को दबाया गया।

जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस सहित अनेक विपक्षी नेता जेल में बंद रहे।

भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ की वैचारिक परंपरा में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार माना जाता है।

1976: तमिलनाडु की DMK सरकार की बर्खास्तगी

आपातकाल के दौरान तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त कर दिया गया।

यह घटना इस आरोप को और मजबूत करती है कि केंद्र सरकार राजनीतिक विरोध को समाप्त करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

42वाँ संविधान संशोधन

1976 में 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया गया।

कई संवैधानिक विशेषज्ञ इसे संविधान के इतिहास का सबसे विवादास्पद संशोधन मानते हैं क्योंकि इससे केंद्र सरकार की शक्तियाँ काफी बढ़ गईं।

1977: जनता का फैसला

आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए चुनाव में जनता ने अपना निर्णय सुना दिया।

कांग्रेस पराजित हुई और जनता पार्टी सत्ता में आई।

यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जाती है क्योंकि जनता ने मतदान के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कर दिखाया कि लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति या दल से बड़ा है।

1978–79: जनता पार्टी में टूट और कांग्रेस की वापसी की तैयारी

जनता पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ने लगे।

इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) के माध्यम से अपना संगठन फिर से मजबूत किया। कई नेता और जनप्रतिनिधि पुनः उनके साथ आने लगे।

1980: सत्ता में वापसी और 9 राज्य सरकारों की बर्खास्तगी

1980 में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं।

सत्ता में लौटने के तुरंत बाद नौ विपक्षी राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया:

  1. उत्तर प्रदेश
  2. बिहार
  3. मध्य प्रदेश
  4. राजस्थान
  5. गुजरात
  6. हरियाणा
  7. पंजाब
  8. ओडिशा
  9. महाराष्ट्र

आलोचकों ने इसे संघीय ढाँचे और राज्यों के जनादेश पर सीधा आघात बताया।

दल-बदल की राजनीति

इंदिरा गांधी के पूरे कार्यकाल में विभिन्न दलों के सांसद और विधायक कांग्रेस में शामिल होते रहे।

चूँकि दल-बदल विरोधी कानून नहीं था, इसलिए सरकारों को अस्थिर करना और राजनीतिक समर्थन जुटाना अपेक्षाकृत आसान था।

यही कारण है कि 1967 से 1985 का काल भारतीय राजनीति में दल-बदल के युग के रूप में जाना जाता है।

शाह आयोग की टिप्पणियाँ

जनता सरकार ने आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया।

आयोग ने कई मामलों में सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक अतिरेक पर गंभीर प्रश्न उठाए।

बाद में क्या बदला?

इंदिरा गांधी के काल के अनुभवों के बाद भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण सुधार हुए:

  • 1985 में दल-बदल विरोधी कानून लागू हुआ।
  • 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई फैसले ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण रोक लगाई।
  • राज्यों की निर्वाचित सरकारों को मनमाने ढंग से हटाना कठिन हो गया।

निष्कर्ष

इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की अत्यंत प्रभावशाली नेता थीं। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश निर्माण जैसी उपलब्धियाँ उनके नाम दर्ज हैं। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस का विभाजन, आपातकाल, अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति उनके शासनकाल के ऐसे पहलू हैं जिन पर आज भी गंभीर बहस होती है।

भाजपा और लोकतंत्र समर्थक विचारधारा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह काल हमें यह सीख देता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, सशक्त विपक्ष और जागरूक नागरिकों से होती है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि अंततः जनता ही सर्वोच्च होती है, और जनता का निर्णय किसी भी सरकार से बड़ा होता है।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भारतीय जनता पार्टी नेता

Thursday, May 28, 2026

कोलकाता में भारतीय जनता मजदूर संघ की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक संपन्न, राष्ट्रीय नेतृत्व रहा उपस्थित

कोलकाता में भारतीय जनता मजदूर संघ की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक संपन्न, राष्ट्रीय नेतृत्व रहा उपस्थित

मंगलवार दिनांक 26 मई 2026 को भारतीय जनता मजदूर संघ द्वारा कोलकाता के हाजरा मोड़ स्थित “सुजाता देवी स्मृति सदन” में पश्चिम बंगाल प्रदेश कार्यकारिणी की दिवसीय बैठक का भव्य आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण बैठक में संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शांत प्रकाश जाटव, पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष कपिला नंद चौधरी सहित राज्य के 24 जिलों से लगभग दो सौ से अधिक कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित सभी अतिथियों का उत्तरिय एवं पुष्पमाला पहनाकर भव्य स्वागत किया गया।

कार्यक्रम का सफल संचालन प्रदेश संगठन मंत्री प्रशांत कुमार दास द्वारा किया गया। बैठक के दौरान विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन द्वारा किए जा रहे कार्यों एवं जनसंपर्क गतिविधियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। कार्यकर्ताओं ने संगठन के विस्तार, श्रमिक हितों से जुड़े मुद्दों तथा सामाजिक कार्यों को लेकर अपने अनुभव भी साझा किए।

बैठक को संबोधित करते हुए पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष कपिला नंद चौधरी ने बताया कि वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल में संगठन के सदस्यों की संख्या लगभग साढ़े आठ लाख तक पहुंच चुकी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष के अंत तक यह संख्या दस लाख से अधिक हो जाएगी। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल क्षेत्र में संगठन की स्थिति अत्यंत मजबूत है और लगातार नए कार्यकर्ता संगठन से जुड़ रहे हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता मजदूर संघ किसी भी राजनीतिक संगठन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ नहीं है और यह पूरी तरह श्रमिकों एवं समाजहित में कार्य करने वाला संगठन है।

वहीं संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शांत प्रकाश जाटव ने अपने संबोधन में कहा कि पश्चिम बंगाल में संगठन पिछले सात वर्षों से लगातार सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि संगठन आज पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुआ है तथा शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी संगठन का तेजी से विस्तार हो रहा है। उन्होंने कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि आने वाले समय में संगठन और अधिक व्यापक स्तर पर श्रमिकों की आवाज़ बनेगा तथा समाज के हर वर्ग तक अपनी पहुंच मजबूत करेगा।

बैठक के दौरान संगठन की आगामी रणनीतियों, सदस्यता अभियान, श्रमिक कल्याण योजनाओं एवं संगठनात्मक विस्तार को लेकर भी विस्तृत चर्चा की गई। कार्यकर्ताओं में उत्साह और संगठन के प्रति समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन संगठन की मजबूती और श्रमिक हितों की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ।


Monday, April 27, 2026

श्रमिक वर्ग के लिए वरदान साबित हुई केंद्र सरकार की योजनाएं – शांत प्रकाश जाटव


दिनांक 26 अप्रैल 2026

श्रमिक वर्ग के लिए वरदान साबित हुई केंद्र सरकार की योजनाएं – शांत प्रकाश जाटव

भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS) के तत्वावधान में बहादराबाद, हरिद्वार में आयोजित “श्रमिक उत्थान एवं जन-जागरूकता सम्मेलन” सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता श्री शांत प्रकाश जाटव (राष्ट्रीय अध्यक्ष, BJMS) ने सभागार में उपस्थित जनसमूह के बीच लगभग 1 घंटा 20 मिनट तक केंद्र सरकार की योजनाओं, वैश्विक परिदृश्य (ईरान युद्ध), महिला सशक्तिकरण एवं श्रमिक अधिकार जैसे विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उपस्थित लोगों ने उनके वक्तव्य को ध्यानपूर्वक सुना और सराहा।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश में राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, नए हवाई अड्डों का निर्माण, गांव-गांव तक बिजली की पहुंच तथा आयुध (डिफेंस) सामग्रियों का निर्माण भारत में शुरू होना—ये सभी उपलब्धियां श्रमिकों की मेहनत का परिणाम हैं। जब देश में निर्माण कार्य होते हैं और उद्योग स्थापित होते हैं, तो रोजगार एवं व्यवसाय के नए अवसर उत्पन्न होते हैं, जिससे व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है और उसे रोजगार के लिए अन्य राज्यों में पलायन नहीं करना पड़ता।

उन्होंने आगे कहा कि एक उद्योग की स्थापना केवल कुछ श्रमिकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उससे जुड़े परिवहन, आवास, होटल, सब्जी विक्रेता, रेडी-पटरी, सप्लाई चेन सहित हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। एक उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50 हजार लोगों को लाभ पहुंचता है, जो राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

श्री जाटव ने BJMS के नारे का उल्लेख करते हुए कहा:
👉 “राष्ट्र के लिए करेंगे काम, नहीं करेंगे चक्का जाम।”

उन्होंने श्रमिकों को सकारात्मक और रचनात्मक आंदोलन का संदेश देते हुए कहा कि यदि किसी मांग को मनवाना हो तो कार्य बंद करने के बजाय उत्पादन बढ़ाकर भी अपनी बात प्रभावी ढंग से रखी जा सकती है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि जैसे जूते बनाने वाले कारीगर एक पैर का जूता बनाकर दूसरे पैर का जूता रोक सकते हैं, उसी प्रकार कार्य बंद किए बिना भी मांगों को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस विचार पर सभागार में उपस्थित लोगों ने जोरदार तालियों से समर्थन किया।

अपने वक्तव्य में उन्होंने केंद्र सरकार के प्रमुख निर्णयों—नोटबंदी, जीएसटी लागू करना, धारा 370 का निरस्तीकरण, राम मंदिर निर्माण—का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कदमों ने देश को नई दिशा दी है। साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना (करोड़ों मकान), स्वच्छ भारत मिशन (लगभग 14 करोड़ शौचालय), किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत योजना, तथा ई-श्रम पोर्टल, जन धन योजना, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं से श्रमिक वर्ग को व्यापक लाभ मिला है।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में:
श्री अजय चौहान (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष),
श्री चौधरी चरण सिंह (राष्ट्रीय महासचिव),
श्री प्रदीप कुमार (राष्ट्रीय सचिव),
श्री कुणाल (राष्ट्रीय सचिव),
श्री जितेंद्र सिंह (राष्ट्रीय सचिव),
श्री प्रवीण कुमार (प्रदेश सचिव, उत्तराखंड),
श्री पॉपिन कुमार मौर्य जी (जिला अध्यक्ष, हरिद्वार)

आदि शामिल रहे।

कार्यक्रम के उपरांत आयोजित पत्रकार वार्ता में पत्रकारों से बातचीत के दौरान श्री शांत प्रकाश जाटव ने कहा:
“यदि सरकार निरंतर 12 वर्षों से अच्छे कार्य कर रही है, तो उन अच्छे कार्यों का उल्लेख करना हमारा कर्तव्य है।”

कार्यक्रम में उपस्थित सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई दी गई।

सूचना विभाग 
भारतीय जनता मजदूर संघ (BJMS)


Tuesday, March 24, 2026

डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी (यशोदा मेडिसिटी) द्वारा मेरी पत्नी अंजू जी का किडनी स्टोन (Left Renal Calculus) के सफल उपचार एवं DJ स्टेंट रिमूवल


डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी (यशोदा मेडिसिटी) द्वारा मेरी पत्नी अंजू जी का किडनी स्टोन (Left Renal Calculus) के सफल उपचार एवं DJ स्टेंट रिमूवल अत्यंत कुशलता और संवेदनशीलता के साथ किया गया।

उनकी विशेषज्ञता, सटीक निर्णय क्षमता और मरीज के प्रति समर्पण वास्तव में सराहनीय है। पूरे उपचार के दौरान हमें पूरा विश्वास और संतोष मिला।

डॉ. कुलदीप अग्रवाल जी एवं उनकी पूरी टीम का हृदय से आभार। 🙏

#DrKuldeepAggarwal #YashodaMedicity #KidneyStone #DJStent #SuccessfulTreatment #Gratitude

— शांत प्रकाश जाटव

Saturday, December 13, 2025

दिल्ली होमगार्ड साथियों के प्रति जिम्मेदारी: एक सतत दायित्व

दिल्ली होमगार्ड साथियों के प्रति जिम्मेदारी: एक सतत दायित्व

दिल्ली के होमगार्ड / गृह रक्षक साथियों से जुड़े विषय जब मेरे संज्ञान में आए, तब मैंने इसे केवल एक समस्या नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।
होमगार्ड बल अनुशासन, सेवा और समर्पण का प्रतीक है, और ऐसे बल के जवानों की आजीविका एवं सम्मान से जुड़ा कोई भी विषय अनदेखा नहीं किया जा सकता।
इसी जिम्मेदारी के तहत मैंने समय-समय पर गृह मंत्रालय, माननीय उपराज्यपाल महोदय, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, होमगार्ड विभाग के महानिदेशक तथा डीटीसी को पत्र लिखकर दिल्ली होमगार्ड साथियों की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया, ताकि प्रशासनिक स्तर पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण बन सके।

मेरा स्पष्ट मत रहा है कि संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मार्ग के माध्यम से ही किसी भी विषय का स्थायी समाधान संभव है।
सरकार से टकराव नहीं, बल्कि तथ्यों और एकता के साथ अपनी बात रखना ही सही दिशा है।

यह कोई एक बार का प्रयास नहीं है, बल्कि एक निरंतर दायित्व है—
और जब तक दिल्ली के किसी भी होमगार्ड साथी की सेवा, सम्मान या रोजगार से जुड़ा प्रश्न रहेगा, तब तक यह विषय जिम्मेदारी के साथ संबंधित मंचों तक पहुँचाया जाता रहेगा।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता मजदूर संघ