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Tuesday, January 04, 2011

संसद की दो प्रमुख समितियां संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और लोक लेखा समिति (पीएसी)

लोकसभा सचिवालय से प्राप्त आंकड़े के अनुसार, अब तक संसद ने बेहद महत्वपूर्ण मुद्दों की जांच के लिए चार बार जेपीसी का गठन किया है जिनमें
  1. 1987 में बोफोर्स तोप सौदा में दलाली के आरोपों की जांच के लिए पहली बार जेपीसी गठित की गयी।
  2. इसके बाद प्रतिभूति एवं बैंकिंग लेनदेन में अनियमितताओं की जांच के लिए 1992 में, 
  3. स्टाक एक्सचेंज घोटाले की जांच के लिए 2001 में तथा 
  4. 2003 में शीतल पेयों में कीटनाशकों की मौजूदगी 
संबंधी रिपोर्टों की जांच के लिए संसद ने जेपीसी गठित की।

इसके विपरीत संसद की ढांचागत समिति व्यवस्था का हिस्सा और हर साल गठित होने वाली पीएसी ने पिछले पांच सालों में 2005 से लेकर 2010 के दौरान 64 बैठकें की और 92 रिपोर्टे संसद को सौंपी।
पीएसी से जुड़े लोकसभा सचिवालय के अधिकारियों ने समिति की कार्यप्रणाली के बारे में बताया कि पीएसी को संसद द्वारा बजट के माध्यम से सरकार को दी जाने वाली धनराशि के खर्च की जांच पड़ताल करने का अधिकार होता है और यह संसदीय ढांचे की व्यवस्था का हिस्सा होती है और हर साल इसका गठन किया जाता है। इतना ही नहीं इसके अध्यक्ष पद की कमान परंपरा के अनुसार विपक्षी सदस्य को सौंपी जाती है।
इस बार भी वरिष्ठ भाजपा नेता डा मुरली मनोहर जोशी इसके अध्यक्ष हैं लेकिन कुल मिलाकर पीएसी में सत्ता पक्ष का ही बहुमत है जिसमें अध्यक्ष समेत लोकसभा के 15 तथा राज्यसभा के सात सदस्य हैं।
जेपीसी के समान ही पीएसी की सिफारिशें भी सरकार के लिए सुक्षावात्मक प्रकति की ही होती हैं और रिकार्ड से पता चलता है कि अब तक पीएसी की 70 फीसदी सिफारिशों को विभिन्न सरकारों ने स्वीकार किया है।
लेकिन यह भी सही है कि पीएसी या जेपीसी अपनी सिफारिशें स्वीकार करने के लिए केन्द्र सरकार पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बना सकती। उधर जेपीसी एक तदर्थ समिति होती है जिसका गठन किसी खास मकसद और एक निश्चित समय अवधि के लिए किया जाता है।