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Saturday, October 22, 2016

सिर्फ युधिष्टर ही द्रौपदी का पति था


सिर्फ युधिष्टर ही द्रौपदी का पति था

विवाद क्यों पैदा हुआ था:-

(१) अर्जुन ने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था, यदि उससे विवाह हो जाता तो कोई परेशानी न होती वह तो स्वयंवर की घोषणा के अनुरुप ही होता।

(२) परन्तु इस विवाह के लिए कुन्ती कतई तैयार नहीं थी।

(३) अर्जुन ने भी इस विवाह से इन्कार कर दिया था। "बड़े भाई से पहले छोटे का विवाह हो जाए यह तो पाप है अधर्म है
"(भवान् निवेशय प्रथमं) मा मा नरेन्द्र त्वमधर्मभाजंकृथा न धर्मोsयमशिष्टः (१९०-८)

(४) कुन्ती मां थी यदि अर्जुन का विवाह भी हो जाता भीम का तो पहले ही हिडम्बा से (हिडम्बा की ही चाहना के कारण) हो गया था। तो सारे देश में यह बात स्वतः प्रसिद्ध हो जाती कि निश्चय ही युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष है जिसके कारण उसका विवाह नहीं हो सकता।

(५) आप स्वयं निर्णय करें कुन्ती की इस सोच में क्या भूल है? वह माता है,अपने बच्चों का हित उससे अधिक कौन सोच सकता है? इसलिए माता कुन्ती चाहती थी और सारे पाण्डव भी यही चाहते थे कि विवाह युधिष्ठिर से हो जाए।

प्रश्न:-क्या कोई ऐसा प्रमाण है जिसमें द्रौपदी ने अपने को केवल एक की पत्नि कहा हो या अपने को युधिष्ठिर की पत्नि बताया हो?
उत्तर:-(1) द्रौपदी को कीचक ने परेशान कर दिया तो दुःखी द्रौपदी भीम के पास आई। उदास थी भीम ने पूछा सब कुशल तो है? द्रौपदी बोली जिस स्त्री का पति राजा युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है?
आशोच्यत्वं कुतस्यस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि ।।- (विराट १८/१)
द्रौपदी स्वयं को केवल युधिष्ठिर की पत्नि बता रही है।

(2) वह भीम से कहती है - जिसके बहुत से भाई, श्वसुर और पुत्र हों, जो इन सबसे घिरी हो तथा सब प्रकार अभ्युदयशील हो, ऐसी स्थिति में मेरे सिवा और दूसरी कौन सी स्त्री दुःख भोगने के लिए विवश हुई होगी-
भ्रातृभिः श्वसुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।
एवं सुमुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ।।-(२०-१३)
द्रौपदी स्वयं कहती है उसके बहुत से भाई हैं, बहुत से श्वसुर हैं, बहुत से पुत्र भी हैं, फिर भी वह दुःखी है। यदि बहुत से पति होते तो सबसे पहले यही कहती कि जिसके पाँच-पाँच पति हैं वह मैं दुःखी हूँ पर होते तब ना।

(3) जब भीम ने द्रौपदी को, कीचक के किये का फल देने की प्रतिज्ञा कर ली और कीचक को मार-मारकर माँस का लोथड़ा बना दिया तब अन्तिम श्वास लेते कीचक को उसने कहा था,"जो सैरन्ध्री के लिए कण्टक था, जिसने मेरे भाई की पत्नि का अपहरण करने की चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचक को मारकर आज मैं अनृण हो जाऊंगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।
शांति लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रीकण्टकम् ।।-(विराट २२-७९)

इस पर भी कोई भीम को द्रौपदी का पति कहता हो तो क्या करें? मारने वाले की लाठी तो पकड़ी जा सकती है, बोलने वाले की जीभ को कोई कैसे पकड़ सकता है?

(4) द्रौपदी को दांव पर लगाकर हार जाने पर जब दुर्योधन ने उसे सभा में लाने को दूत भेजा तो द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया।उसने कहा जब राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं अपने को दांव पर लगाकर हार चुका था तो वह हारा हुआ मुझे कैसे दांव पर लगा सकता है? महात्मा विदुर ने भी यह सवाल भरी सभा में उठाया। द्रौपदी ने भी सभा में ललकार कर यही प्रश्न पूछा था। क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर मुझे दांव पर लगा सकता था? सभा में सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।
तब केवल भीष्म ने उत्तर देने या लीपा-पोती करने का प्रयत्न किया था और कहा था,"जो मालिक नहीं वह पराया धन दांव पर नहीं लगा सकता परन्तु स्त्री को सदा अपने स्वामी के ही अधीन देखा जा सकता है।

अस्वाभ्यशक्तः पणितुं परस्व ।स्त्रियाश्च भर्तुरवशतां समीक्ष्य ।-(२०७-४३)
ठीक है युधिष्ठिर पहले हारा है पर है तो द्रौपदी का पति और पति सदा पति रहता है, पत्नि का स्वामी रहता है।
यानि द्रौपदी को युधिष्ठिर द्वारा हारे जाने का दबी जुबान में भीष्म समर्थन कर रहे हैं।यदि द्रौपदी पाँच की पत्नि होती तो वह, बजाय चुप हो जाने के पूछती, जब मैं पाँच की पत्नि थी तो किसी एक को मुझे हारने का क्या अधिकार था? द्रौपदी न पूछती तो विदुर प्रश्न उठाते कि"पाँच की पत्नि को एक पति दाँव पर कैसे लगा सकता है?यह न्यायविरुद्ध है।"

स्पष्ट है द्रौपदी ने या विदुर ने यह प्रश्न उठाया ही नहीं। यदि द्रौपदी पाँचों की पत्नि होती तो यह प्रश्न निश्चय ही उठाती।

इसीलिए भीष्म ने कहा कि द्रौपदी को युधिष्ठिर ने हारा है। युधिष्ठिर इसका पति है चाहे पहले स्वयं अपने को ही हारा हो पर है तो इसका स्वामी ही और नियम बता दिया "जो जिसका स्वामी है वही उसे किसी को दे सकता है,जिसका स्वामी नहीं उसे नहीं दे सकता।"

(5) द्रौपदी कहती है- कौरवो, मैं धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नि हूँ तथा उनके ही समान वर्ण वाली हूँ।

सिर्फ युधिष्टर ही द्रौपदी का पति था


सिर्फ युधिष्टर ही द्रौपदी का पति था

विवाद क्यों पैदा हुआ था:-

(१) अर्जुन ने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था, यदि उससे विवाह हो जाता तो कोई परेशानी न होती वह तो स्वयंवर की घोषणा के अनुरुप ही होता।

(२) परन्तु इस विवाह के लिए कुन्ती कतई तैयार नहीं थी।

(३) अर्जुन ने भी इस विवाह से इन्कार कर दिया था। "बड़े भाई से पहले छोटे का विवाह हो जाए यह तो पाप है अधर्म है
"(भवान् निवेशय प्रथमं) मा मा नरेन्द्र त्वमधर्मभाजंकृथा न धर्मोsयमशिष्टः (१९०-८)

(४) कुन्ती मां थी यदि अर्जुन का विवाह भी हो जाता भीम का तो पहले ही हिडम्बा से (हिडम्बा की ही चाहना के कारण) हो गया था। तो सारे देश में यह बात स्वतः प्रसिद्ध हो जाती कि निश्चय ही युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष है जिसके कारण उसका विवाह नहीं हो सकता।

(५) आप स्वयं निर्णय करें कुन्ती की इस सोच में क्या भूल है? वह माता है,अपने बच्चों का हित उससे अधिक कौन सोच सकता है? इसलिए माता कुन्ती चाहती थी और सारे पाण्डव भी यही चाहते थे कि विवाह युधिष्ठिर से हो जाए।

प्रश्न:-क्या कोई ऐसा प्रमाण है जिसमें द्रौपदी ने अपने को केवल एक की पत्नि कहा हो या अपने को युधिष्ठिर की पत्नि बताया हो?
उत्तर:-(1) द्रौपदी को कीचक ने परेशान कर दिया तो दुःखी द्रौपदी भीम के पास आई। उदास थी भीम ने पूछा सब कुशल तो है? द्रौपदी बोली जिस स्त्री का पति राजा युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है?
आशोच्यत्वं कुतस्यस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि ।।- (विराट १८/१)
द्रौपदी स्वयं को केवल युधिष्ठिर की पत्नि बता रही है।

(2) वह भीम से कहती है - जिसके बहुत से भाई, श्वसुर और पुत्र हों, जो इन सबसे घिरी हो तथा सब प्रकार अभ्युदयशील हो, ऐसी स्थिति में मेरे सिवा और दूसरी कौन सी स्त्री दुःख भोगने के लिए विवश हुई होगी-
भ्रातृभिः श्वसुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।
एवं सुमुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ।।-(२०-१३)
द्रौपदी स्वयं कहती है उसके बहुत से भाई हैं, बहुत से श्वसुर हैं, बहुत से पुत्र भी हैं, फिर भी वह दुःखी है। यदि बहुत से पति होते तो सबसे पहले यही कहती कि जिसके पाँच-पाँच पति हैं वह मैं दुःखी हूँ पर होते तब ना।

(3) जब भीम ने द्रौपदी को, कीचक के किये का फल देने की प्रतिज्ञा कर ली और कीचक को मार-मारकर माँस का लोथड़ा बना दिया तब अन्तिम श्वास लेते कीचक को उसने कहा था,"जो सैरन्ध्री के लिए कण्टक था, जिसने मेरे भाई की पत्नि का अपहरण करने की चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचक को मारकर आज मैं अनृण हो जाऊंगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।
शांति लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रीकण्टकम् ।।-(विराट २२-७९)

इस पर भी कोई भीम को द्रौपदी का पति कहता हो तो क्या करें? मारने वाले की लाठी तो पकड़ी जा सकती है, बोलने वाले की जीभ को कोई कैसे पकड़ सकता है?

(4) द्रौपदी को दांव पर लगाकर हार जाने पर जब दुर्योधन ने उसे सभा में लाने को दूत भेजा तो द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया।उसने कहा जब राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं अपने को दांव पर लगाकर हार चुका था तो वह हारा हुआ मुझे कैसे दांव पर लगा सकता है? महात्मा विदुर ने भी यह सवाल भरी सभा में उठाया। द्रौपदी ने भी सभा में ललकार कर यही प्रश्न पूछा था। क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर मुझे दांव पर लगा सकता था? सभा में सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।
तब केवल भीष्म ने उत्तर देने या लीपा-पोती करने का प्रयत्न किया था और कहा था,"जो मालिक नहीं वह पराया धन दांव पर नहीं लगा सकता परन्तु स्त्री को सदा अपने स्वामी के ही अधीन देखा जा सकता है।

अस्वाभ्यशक्तः पणितुं परस्व ।स्त्रियाश्च भर्तुरवशतां समीक्ष्य ।-(२०७-४३)
ठीक है युधिष्ठिर पहले हारा है पर है तो द्रौपदी का पति और पति सदा पति रहता है, पत्नि का स्वामी रहता है।
यानि द्रौपदी को युधिष्ठिर द्वारा हारे जाने का दबी जुबान में भीष्म समर्थन कर रहे हैं।यदि द्रौपदी पाँच की पत्नि होती तो वह, बजाय चुप हो जाने के पूछती, जब मैं पाँच की पत्नि थी तो किसी एक को मुझे हारने का क्या अधिकार था? द्रौपदी न पूछती तो विदुर प्रश्न उठाते कि"पाँच की पत्नि को एक पति दाँव पर कैसे लगा सकता है?यह न्यायविरुद्ध है।"

स्पष्ट है द्रौपदी ने या विदुर ने यह प्रश्न उठाया ही नहीं। यदि द्रौपदी पाँचों की पत्नि होती तो यह प्रश्न निश्चय ही उठाती।

इसीलिए भीष्म ने कहा कि द्रौपदी को युधिष्ठिर ने हारा है। युधिष्ठिर इसका पति है चाहे पहले स्वयं अपने को ही हारा हो पर है तो इसका स्वामी ही और नियम बता दिया "जो जिसका स्वामी है वही उसे किसी को दे सकता है,जिसका स्वामी नहीं उसे नहीं दे सकता।"

(5) द्रौपदी कहती है- कौरवो, मैं धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नि हूँ तथा उनके ही समान वर्ण वाली हूँ।

Thursday, December 11, 2014

संत रविदास जिन्होंने बर्बर इस्लाम की चुनौती स्वीकार हिन्दू धर्म की रक्षा की


          दिल्ली में सिकंदर लोदी का शासन था हिन्दू धर्मावलम्बियों का जीना दूभर हो गया था, उन पर बिभिन्न प्रकार के कर लगाये जा रहे थे शादी-ब्याह पर जजिया -कर, तीर्थ यात्रा पर जजिया -कर, यहाँ तक की शव-दाह पर जजिया -कर, हिन्दू समाज त्राहि-त्राहि कर रहा था, रामानंद की भगवत भक्ति, देश भक्ति में परिणित हो गयी और इस्लाम की चुनौती को स्वीकार किया, इसके लिए रामानंद स्वामी ने द्वादश भागवत शिष्य तैयार किये जो बिभिन्न जाति के थे, उस समय देश में भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तक जगद्गुरु रामानंद अपने शिष्यों के साथ भारत भ्रमण कर धर्म रक्षा का संकल्प दिला रहे थे उनके प्रमुख शिष्यों में एक संत रविदास भी थे, जो सर्बाधिक प्रभावशाली लोकप्रिय तथा अत्यंत पिछड़ी जाति से थे रामानंद स्वामी अपने हिन्दू समाज की विकृती को जानते थे, उन्होंने मुसलमानों की उस चुनौती को स्वीकार कर सभी जातियों में चमत्कारी संतो की शृंखला खड़ी कर दी और बहुत से पिछड़ी जाति के संतो को समाज में सम्मान दिलाया इतना ही नहीं वे संत इतने बड़े हो गए की धर्मान्तरण को रोक ही नहीं तो घर वापसी का अलख जगा दिया, कही भी सूफियो अथवा कठमुल्लों को जबाब देने के लिए संत रविदास को ही खड़ा कर देते, संत रविदास समरसता के वाहक बनकर खड़े हो गए और तमाम पिछड़ी जातियों में होते धर्मान्तरण को रोक दिया आज हम देखते हैं की तथा-कथित उच्च जातियों में पिछले पांच-छह सौ वर्षो में तेजी से धर्मान्तरण हुआ जो आज भी हमें दिखाई देता है लेकिन तथा- कथित पिछड़ी जातियों हमें बहुत कम इस्लाम मतावलंबी दिखाई देते हैं यह संत रविदास के प्रभाव का ही परिणाम है.

       संत रविदास का जन्म ६२३ वर्ष पूर्व माघ पूर्णिमा (सन १३९८) १४३३ बिक्रम सम्बत दिन रविवार को काशी के मडुवाडीह में हुआ था वे अत्यंत निर्धन परिवार में पैदा हुए थे घर में जूता बनाने यानी मोची का पैत्रिक काम अपनाया, रामानंद स्वामी के शिष्य बनने के पश्चात् उनका जीवन ही बदल गया जैसे उन्हें कोई पारस पत्थर ने छू लिया हो, वे भारत वर्ष के महान संत हो गए जैसे किसी हीरे को तरास कर उसको उपयोगी बनाया जाता है उस प्रकार रविदास को तरासकर रामानंद ने चमत्कारी संत बना दिया एक कहावत है ---- ''जौ मन चंगा तो कठौती में गंगा'', कहते है की एक बुढ़िया माता जी गंगा जी में स्नान करने गयी थी उनका एक कंगन गंगा जी में गिर गया उस माताजी को बड़ा ही विस्वास था कि संत रविदास यदि चाहेगे तो उसका दूसरा कंगन मिल जायेगा बड़ी ही भक्ति- भाव से रविदास से आकर बताया संत रविदास मोची का काम करते थे यानी जूता बनाकर जीवको-पार्जन करते थे कठौती में पानी भरा रहता था उसी में चमडा भिगोकर सिलते थे बुढ़िया माता जी पर बड़ी दया आई और उन्होंने कहा 'जो मन चंगा तो कठौती में गंगा' और अपना हाथ उसी कठौती में घुमाया कंगन मिल गया उस माता जी को कंगन दे दिया वह बुढ़िया भगवान का बंदन करती चली गयी, तबसे यह कथा प्रचलित हो गयी की ''जो मन चंगा तो कठौती में गंगा'' उनके चमत्कार का प्रभाव पूरे देश में पड़ा केवल हिन्दू समाज पर ही नहीं तो तमाम मुसलमान भी उनसे प्रभावित होने लगे .

         महाराणा परिवार की महारानी मीरा को कौन नहीं जानता --? वे चित्तौड़ से चलकर काशी आयीं और रामानंद स्वामी से निवेदन किया कि वे उन्हें अपना शिष्य बना ले स्वामी जी ने वहीँ बैठे संत रविदास की ओर इशारा करते हुए कहा तुम्हारे योग्य गुरु तो संत रविदास ही है महारानी मीरा ने तुरंत ही संत रविदास की शिष्या बन गयी और वे महारानी मीरा से कृष्णा भक्त मीराबायी हो गयी इससे बड़ा समरसता का उदहारण कहाँ मिलेगा, उन्हें भगवान कृष्ण का साक्षात्कार हुआ ये संत रविदास की ही कृपा है संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे उसी का परिणाम है आज भी पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं.

          संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकंदरसाह लोदी ने सदन कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जनता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं सदन कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गया उसका नाम सदन कसाई से रामदास हो गया, दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी क्रोधित होकर इनके अनुयायियों को चमार यानी चंडाल घोषित कर दिया ( तब से इस समाज के लोग अपने को चमार कहने लगे) उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन उन्होंने कहा ----- 
         ''वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान, 
           फिर मै क्यों छोडू इसे पढ़ लू झूठ कुरान. 
           वेद धर्म छोडू नहीं कोसिस करो हज़ार, 
           तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार''.----(रैदास रामायण)

 यातनाये सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे, और अपने अनुयायियों को बिधर्मी होने से बचा लिया, ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया इनकी मृत्यु चैत्र शुक्ल चतुर्दसी विक्रम सम्बत १५८४ रविवार के दिन चित्तौड़ में हुआ, वे आज हमारे बीच नहीं है उनकी स्मृति आज भी हमें उनके आदर्शो पर चलने हेतु प्रेरित करती है आज भी उनका जीवन हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है, हमें यह ध्यान रखना होगा की आज के छह सौ वर्ष पहले चमार जाती थी ही नहीं, इस समाज ने पद्दलित होना स्वीकार किया, धर्म बचाने हेतु सुवर पलना स्वीकार किया, लेकिन बिधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है, हिन्दू समाज में छुवा-छूत, भेद-भाव, उंच-नीच का भाव था ही नहीं ये सब कुरीतियाँ इस्लामिक काल की देन है, हमें इस चुनौती को स्वीकार कर इसे समूल नष्ट करना होगा यही संत रविदास के प्रति सच्ची भक्ति होगी.
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संत शिरोमणि रविदास

गीता के महत्व से एक चर्मकार नें मुगल शासन में अपनी क्षत्रिय शिष्या मीरा को जोड़ा दुनिया ने उन्हें संत शिरोमणि रविदास कहा।
#Reservation #Mar