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Friday, October 06, 2017

मोदी जी वाराणसी में और हम तावडू गुरुग्राम में

मोदी जी वाराणसी में 22 सितम्बर 2017 और हम तावडू गुरुग्राम में अगस्त 2017 को गौसेवा ईश्वरीय सेवा

Sunday, January 10, 2016

अनुसूचित जातियां अछूत या अस्पर्श्य नहीं




Saturday, January 09, 2016

अनुसूचित जातियां अछूत या अस्पर्श्य नहीं




अनुसूचित जातियां अछूत या अस्पर्श्य नहीं


प्रतिष्ठा में,                                                   दिनांक – 9 जनवरी 2016

आदरणीय श्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी
माननीय प्रधानमन्त्री, भारत सरकार,
प्रधानमन्त्री कार्यालय, साउथ ब्लाक, नई दिल्ली – 110011

विषय – अनुसूचित जातियां अछूत या अस्पर्श्य नहीं

मान्यवर,

भारत में पहली बार जनगणना 1881 में अंग्रेजी हुकुमत द्वारा की गई 1891 और 1901 तक जनगणना धर्माधारित होती रही, जिसमें 1. मुस्लिम 2. हिन्दू 3. ईसाई की गणना होती थी. 1911 की जनगणना में हिन्दू धर्म को विभाजित करने के आशय से हिन्दुओं को अंग्रेजों नें तीन वर्गों में बांटा. 

1. हिन्दू 
2. प्रकृति पूजक आदिवासी 
3. अछूत

अछूतों की गणना बाकी लोगों से अलग करने के लिए जनगणना आयुक्त नें दस मानदण्ड अपनाये, अर्थात अछूत वह है जो –

1        ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को नहीं मानते
2.       किसी ब्राह्मण या अन्य मान्यता प्राप्त हिन्दू से गुरु दीक्षा नहीं लेते
3.       वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करते
4.       बड़े-बड़े हिन्दू देवी देवताओं की पूजा नहीं करते
5.       ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते
6.       जिनका कोई ब्राह्मण पुरोहित बिलकुल भी नहीं होता
7.       जो साधारण हिन्दू मंदिरों के गर्भ-स्थान में प्रवेश नहीं कर सकते
8.       जिनसे छूत लगती है
9.       जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं
10.    जो गोमांस खाते हैं और गए की पूजा नहीं करते  

इन मानदंडों में चमड़े का कार्य, मल उठाना, कपड़ा बुनना, मांस का कार्य आदि करने वाला अछूत होगा ऐसा कोई उल्लेख नहीं है.

1935 भारत सरकार अधिनियम में अंग्रेज सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों में 429 जातियां शामिल की गईं जिसके सन्दर्भ में डॉ अम्बेडकर नें अपनी पुस्तक अछूत कौन और कैसे में भी वर्णन किया है की वैदिक वर्ण व्यवस्था में अस्पर्श कार्य करने वाली जातियों में से केवल एक जाति को इस अनुसूची में शामिल किया गया है उनके इस कथन से यह सिद्ध होता है की शेष 428 जातियां वर्ण व्यवस्था के आधार पर अछूत नहीं बल्कि ऊपर लिखित अंग्रेजों द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार अछूत हैं.उक्त दस मानदंडों को पढ़ने से साफ़-साफ़ समझा जा सकता है की सिर्फ हिन्दू धर्म को विभाजित करने के आशय से अंग्रेजों द्वारा यह मानदण्ड अपनाये गए.

मेरा आपसे विनम्रता पूर्वक आग्रह है चूँकि उक्त तथ्यों से यह प्रमाणित हो रहा है की अनुसूचित जातियां अछूत या अस्पर्श्य कर्माधारित नहीं और न ही 5000 साल पुरानी वैदिक वर्ण व्यवस्था अनुसार बल्कि हिन्दू धर्म को विभाजित करने के आशय से अंग्रेजों द्वारा तय किये गए मानदंडों के आधार पर घोषित की गई लिहाजा इन मानदंडों को ख़ारिज कर अनुसूचित जातियों के सन्दर्भ में समीक्षा कर पुनर्विचार किया जाये.

भवदीय

शान्त प्रकाश जाटव  
  





Thursday, December 03, 2015

डॉ अम्बेडकर के दीक्षा स्थल नागपुर पर हिन्दू धर्म विरोधी प्रतिज्ञाओं का अवैध शिलापट हटाने के सन्दर्भ में शिकायत पत्र.







डॉ अम्बेडकर के दीक्षा स्थल नागपुर पर हिन्दू धर्म विरोधी प्रतिज्ञाओं का अवैध शिलापट हटाने के सन्दर्भ में शिकायत पत्र.



प्रतिष्ठा में,                                            दिनांक – 3 दिसम्बर 2015

आदरणीय श्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी
माननीय प्रधानमन्त्री, भारत सरकार,
प्रधानमन्त्री कार्यालय, साउथ ब्लाक, नई दिल्ली – 110011

विषय – डॉ अम्बेडकर के दीक्षा स्थल नागपुर पर हिन्दू धर्म विरोधी प्रतिज्ञाओं का अवैध शिलापट हटाने के सन्दर्भ में शिकायत पत्र.

मान्यवर,

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ भीम राव अम्बेडकर जी ने खुद और अपने समर्थकों के साथ एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया जिसमें एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न “बुद्धं, धम्म, संघं” और पंचशील 1. हत्या न करना 2. चोरी न करना 3. व्यभिचार न करना 4. असत्य न बोलना 5. मद्धपान न करना, को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया. 4 एकड़ में फैले दीक्षा स्थल पर भव्य स्तूप का उद्घाटन 18 दिसम्बर 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम के. आर. नारायणन जी द्वारा किया गया.

वर्ष 2012 में दीक्षा स्थल के प्रांगण में एक शिलापट लगाया गया है जिसपर 22 प्रतिज्ञाएँ लिखी हैं जिन्हें डॉ अम्बेडकर द्वारा ली गई प्रतिज्ञाएँ बताया गया है जो निम्नानुसार हैं –

1.    मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
2.    मैं राम और कृष्ण जो भगवान के अवतार माने जाते हैं में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
3.    मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
4.    मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ.
5.    मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ.
6.    मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
7.    मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा.
8.    मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा.
9.    मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ.

10.  मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा.

11.  मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करूँगा.

12.  मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परिमितों का पालन करूँगा.

13.  मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.

14.  मैं चोरी नहीं करूँगा.

15.  मैं झूठ नहीं बोलूँगा.

16.  मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.

17.  मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.

18.  मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.

19.  मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ.

20.  मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.

21.  मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).

22.  मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

अपने धर्म का प्रचार करना व्यवाहरिक है परन्तु किसी अन्य ध्रर्म का अपमान करना न केवल अव्यवहारिक बल्कि असंवैधानिक है. वैसे भी उक्त प्रतिज्ञाओं के सन्दर्भ में डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित कोई भी प्रमाणिक पुस्तक या दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रतीत होता है की यह किसी षड्यंत्र के तहत सिर्फ हिन्दू धर्म को दुनिया में बदनाम करने के आशय से उक्त शिलापट लगाया गया है.

डॉ अम्बेडकर दीक्षा स्थल बुद्ध धर्म का प्रचार व् शोध केंद्र भी है इसलिए सम्पूर्ण विश्व से लाखों श्रद्धालु, सैलानी, छात्र व् शोधकर्ता इस स्थान पर पूजा, पर्यटन व् अध्यन के लिए आते हैं जो इस शिलापट पर लिखी प्रतिज्ञाओं को पढकर हिन्दू धर्म के प्रति दुर्भावना मन में बना कर साथ ले जाते हैं. अचरज का विषय है की इस दीक्षा स्थल का रख रखाव सरकार द्वारा किया जाता है और उसकी आँखों के सामने हिन्दू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार हो रहा है.

जिससे मेरे सहित तमाम हिन्दुओं की भावनाओं को कष्ट पहुँचता है.

मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है की जिन्होंने इसको लगाया उनके खिलाफ धार्मिक भावनाओं को भड़काने के षड्यंत्र के आरोप में सख्त से सख्त कार्यवाही की जानी सुनिश्चित करे और हिन्दुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उक्त शिलापट को तुरंत हटाये जाने के लिए निर्देशित करें.

भवदीय



शान्त प्रकाश जाटव

Sunday, October 18, 2015

अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट ( Veer Chamar Regiment ) की भारतीय सेना में पुन: स्थापना हेतु प्रधानमन्त्री जी को लिखा पत्र



अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट ( Veer Chamar Regiment ) की भारतीय सेना में पुन: स्थापना हेतु प्रधानमन्त्री जी को लिखा पत्र 

Saturday, October 17, 2015

अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट ( Veer Chamar Regiment ) की भारतीय सेना में पुन: स्थापना हेतु प्रधानमन्त्री जी को लिखा पत्र



अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट ( Veer Chamar Regiment ) की भारतीय सेना में पुन: स्थापना हेतु प्रधानमन्त्री जी को लिखा पत्र 

अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट ( Veer Chamar Regiment ) की भारतीय सेना में पुन: स्थापना हेतु प्रधानमन्त्री जी को लिखा पत्र

प्रतिष्ठा में,                                             दिनांक 17 अक्टूबर 2015

आदरणीय श्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी
माननीय प्रधानमन्त्री, भारत सरकार,
प्रधानमन्त्री कार्यालय, साउथ ब्लाक, नई दिल्ली – 110011

विषय: अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित वीर चमार रेजिमेंट की भारतीय सेना में पुन: स्थापना

मान्यवर,
अंग्रेजों द्वारा स्थापित चमार रेजिमेंट को आई एन ए से मुकाबले के लिए अंग्रेजों द्वारा कैप्टन मोहन लाल कुरील के नेतृत्व में सिंगापुर भेजा गया. जहाँ कैप्टन मोहन लाल कुरील नें देखा की अंग्रेज चमारों के हाथों अपने ही देशवासियों को मरवा रहे हैं, परिणामस्वरूप उन्होंने चमार रेजिमेंट को आई एन ए में शामिल कर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. अंग्रेजों नें 1946 में चमार रेजिमेंट पर प्रतिबन्ध लगा दिया. अंग्रेजों से युद्ध के दौरान हजारो चमारों नें अपने प्राणों की आहुति दी, कुछ म्यांमार व् थाईलेंड के जंगलों में भटक गए जो पकड़े गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. कैप्टन मोहन लाल कुरील को भी युद्धबंदी बना लिया गया जिन्हें आजादी के बाद रिहा किया गया जो 1952 में उन्नाव की सफीपुर विधान सभा से विधायक भी रहे.

जैसा की विदित है की चमार रेजिमेंट नें आई एन ए के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध कर न केवल देशभक्ति का परिचय दिया बल्कि चमार जाति का सिर भी गौरव से ऊँचा किया.

इस पत्र के माध्यम से आपसे विनम्र आग्रह है की चमारों की वीरता के गौरवशाली इतिहास को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना में चमार रेजिमेंट को पुन: स्थापित करने का कष्ट करें.

सादर

भवदीय


(शान्त प्रकाश जाटव)


Wednesday, September 02, 2015

Letter to Prime Minister to abolish reservation

Movement Against Reservation - MAR
279, Gyan Khand-1, Indira Puram, Ghaziabad, UP

दिनांक – 2 सितम्बर 2015

प्रतिष्ठा में,

आदरणीय प्रधानमन्त्री जी
भारत सरकार
साउथ ब्लाक, नई दिल्ली – 110011
  
विषय – मौजूदा जातिगत आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा हेतु ज्ञापन

आरक्षित सीट से चुनाव जीते ज्यादातर सांसद या विधायक हर बार आरक्षित सीट से कई-कई दफा चुनाव लड़ते हैं या फिर उनका कोई परिजन उसी सीट से चुनाव लड़ता हैं जाहिर सी बात है वो कभी नहीं चाहेंगे की आरक्षण खत्म हो. आरक्षण से बने आईएएस, पीसीएस, डॉक्टर, इंजिनियर अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के बावजूद प्रतिसपर्धाई परीक्षा में आरक्षित सीट से बारम्बार लाभ लेते हैं जिस कारण से गरीब अभाव में पढ़ा जरूरतमन्द बालक उसका लाभ लेने से वंचित रह जाता है.जाहिर सी बात है वो भी कभी नहीं चाहेंगे की आरक्षण खत्म हो.
कुछ वर्षों से एक नया चलन चल पड़ा है अधिकांश राजनैतिक दल आरक्षण का प्रलोभन देकर विभिन्न जाति के लोगों को गुमराह करने का काम कर रहे हैं यह जानते हुए की तय सीमा 50% से अधिक आरक्षण देना सम्भव नहीं है. परिणाम स्वरुप देश में अराजक स्थिति पैदा की जाती है जानमाल का नुकसान भी होता है.

·         दुनिया में भारत के अतिरिक्त कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ जातीय आधार पर आरक्षण दिया जाता हो. आरक्षण व्यवस्था ब्रिटिश शासन में देश व् समाज विभाजित करने की योजनाबद्ध साजिश थी जो पुरानी मद्रास प्रेसिडेंसी द्वारा 1765 से शुरू हुई 1901 में महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में साहू जी महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया, 1921 में मद्रास प्रेसिडेंसी नें जातिगत आरक्षण का सरकारी आज्ञा पत्र जारी किया, जिसमें 44% गैर ब्राहमण, 16% ब्राह्मण, 16% मुसलमान, 16% भारतीय एंग्लो ईसाई और 8% अछूतों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया. उक्त आरक्षण से 16% मुस्लिम समाज को अलग करने का अंग्रेजों का षड्यंत्र पूरा हुआ
   
   1935  भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत अनुसूचित जाति के लिए 8% आरक्षण का प्रावधान किया गया जिसमें 429 जातियां सूचीबद्ध की गईं 1947 में हिंदुस्तान विभाजित हुआ आबादी घटी परन्तु 1950 में लागू भारतीय संविधान में इनके लिए 15% आरक्षण का प्रावधान हुआ और जातियों की संख्या बढाकर 593 की गई जो आज अर्थात 2015 में बढ़कर 1208 हो गई हैं, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान किया गया था जिनकी संख्या 212 थी जो 2015 में बढ़कर 437 हो चुकी है. 1979 में पिछड़ी जातियों को 52% आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिश के बावजूद, 27% आरक्षण 50% सीमित सीमा होने के कारण दिया गया जिसमें 1257 पिछड़ी जातियों को सूचीबद्ध किया था जो 2006 में बढ़ाकर 2297 की गई है,

1935 भारत सरकार अधिनियम में अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किये गए थे, 1950 भारत के संविधान में भी उक्त प्रावधान 10 वर्षों के लिए रखा गया जिसको छ: दशकों से हर 10 वर्ष बाद संविधान संशोधन के जरिये बढ़ा दिया जाता है.

हमारा आपसे विनम्रता पूर्वक आग्रह हैं की
  1. जातीय आधार पर दी जाने वाली आरक्षण व्यवस्था खत्म की जाये
  2. राजनैतिक क्षेत्र में दिया जाने वाला आरक्षण खत्म किया जाये
  3. राजनैतिक दलों द्वारा आरक्षण का प्रलोभन दिया जाना प्रतिबंधित हो.
आरक्षण बढ़ने व्  प्रतिनिधित्व के लिए अल्पकालीन माध्यम तो हो सकता है जन्म सिद्ध अधिकार किसी भी स्थिति में नहीं.

धन्यवाद,

भवदीय


(शान्त प्रकाश जाटव)
राष्ट्रीय अध्यक्ष 
phone - 09871952799