Chamar Regiment
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Wednesday, March 08, 2017
भाजपा नेता शान्त प्रकाश जाटव की मुहीम हुई कामयाब रक्षा मंत्री के बाद अनुसूचित जाति आयोग ने चमार रेजिमेंट बहाली के लिया संज्ञान
क्या ‘चमार रेजीमेंट’ फिर होगी बहाल, आयोग ने केंद्र को दिया नोटिस
Updated: February 28, 2017, 7:11 PM IST
क्या आपको पता है कि सेना में चमार रेजीमेंट भी थी, जो सिर्फ 3 साल ही अस्तित्व में रही. अब सेना में इस रेजीमेंट की बहाली के लिए पहली बार कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है. इसकी मांग को लेकर होने वाले कुछ प्रदर्शनों की खबरों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने संज्ञान लिया है.
आयोग के सदस्य ईश्वर सिंह ने रक्षा सचिव को नोटिस कर दिया है. दलितों का यह बड़ा मामला पहली बार इस स्तर पर उठाया जा रहा है. ईश्वर सिंह ने न्यूज 18 हिंदी डॉटकॉम से बातचीत में कहा कि आज ही सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा गया है कि आखिर इस रेजीमेंट को किन कारणों से बंद किया गया.
ईश्वर सिंह का कहना है कि दलित किसी भी विषम परिस्थिति में रह लेता है. उतनी कठिनाई में शायद ही कोई और जीवन व्यतीत करता हो जितनी में ये लोग रहते हैं फिर भी इनकी रेजीमेंट सेना में बहाल क्यों नहीं की जा रही है. इस नोटिस के बाद नई बहस छिड़ने की उम्मीद है. आजादी के बाद से ही चमार रेजीमेंट बहाल किए जाने की आवाज कई बार उठाई गई, लेकिन आवाज दबकर रह गई. दलित इस रेजीमेंट को बहाल करने के लिए कई राज्यों में प्रदर्शन कर चुके हैं
ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि चमार रेजीमेंट थी तो उसे क्यों खत्म किया गया. बीजेपी अनुसूचित मोर्चा
से जुड़े दलित नेता शान्त प्रकाश जाटव ने अक्टूबर 2015 में केंद्र सरकार से इस रेजीमेंट की बहाली की मांग
की थी. उनका दावा है कि इसी मांग पर नवंबर 2015 में पर्रिकर ने लिखा था कि ‘मामले की जांच करवा रहा हूं’.
ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि चमार रेजीमेंट थी तो उसे क्यों खत्म किया गया. बीजेपी अनुसूचित मोर्चा
से जुड़े दलित नेता शान्त प्रकाश जाटव ने अक्टूबर 2015 में केंद्र सरकार से इस रेजीमेंट की बहाली की मांग
की थी. उनका दावा है कि इसी मांग पर नवंबर 2015 में पर्रिकर ने लिखा था कि ‘मामले की जांच करवा रहा हूं’.
चमार रेजीमेंट का इतिहास
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेज सरकार ने थलसेना में चमार रेजीमेंट बनार्ई थी, जो 1943 से 1946 तक अस्तित्व में रही. दलितों के कल्याण से जुड़े संगठनों एवं जाटव का दावा है कि वीर चमार रेजीमेंट को अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था. रक्षा मंत्री को लिखे पत्र में दावा किया गया है कि अंग्रेजों ने चमार रेजीमेंट को आजाद हिंद फौज से मुकाबला करने के लिए अंग्रेजों ने सिंगापुर भेजा. इस रेजीमेंट का नेतृत्व कैप्टन मोहनलाल कुरील ने किया था.
जहां कैप्टन कुरील ने देखा कि अंग्रेज चमार रेजीमेंट के सैनिकों के हाथों अपने ही देशवासियों को मरवा रहे हैं. उन्होंने चमार रेजीमेंट को आईएनए में शामिल कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. इसके बाद अंग्रेजों नें 1946 में चमार रेजीमेंट पर प्रतिबंध लगा दिया.
चमार रेजीमेंट के बचे सिपाही, फोटो: सतनाम सिंह
अंग्रेजों से युद्ध के दौरान चमार रेजीमेंट के सैकड़ों सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी. कुछ म्यांमार व थाईलेंड के जंगलों में भटक गए. जो पकड़े गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. कैप्टन मोहनलाल कुरील को भी युद्धबंदी बना लिया गया. जिन्हें आजादी के बाद रिहा किया गया. वह 1952 में उन्नाव की सफीपुर विधान सभा से विधायक भी रहे.
रेजीमेंट पर लिखी गई है किताब
हवलदार सुलतान सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और अनुसूचित जातियों की सेना में भागीदारी’ शीर्षक से किताब लिखी. दूसरी किताब सतनाम सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्हीं की जुबानी’ नाम से लिखी.
इस समय सेना में मराठा लाइट इन्फेंट्री, राजपूताना राइफल्स, राजपूत रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, डोगरा रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट, गोरखा रेजीमेंट है.
चमार रेजीमेंट पर जेएनयू ने शुरू कराया रिसर्च
-‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्हीं की जुबानी’ नामक किताब के लेखक सतनाम सिंह जेएनयू में इस रेजीमेंट पर शोध कर रहे हैं. सिंह ने न्यूज 18 हिंदी डॉटकॉम से बातचीत में बताया इस रेजीमेंट के तीन सैनिक अभी जिंदा हैं. इसके सैनिक रहे चुन्नीलाल हरियाणा के महेंद्रगढ़, जोगीराम भिवानी और धर्मसिंह सोनीपत के रहने वाले हैं.
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