राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS): पंजीकरण, संविधान, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम और शाखा व्यवस्था का तथ्यात्मक अध्ययन
लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में की गई थी। लगभग एक शताब्दी के इतिहास वाले इस संगठन ने भारतीय समाज, संस्कृति, शिक्षा, सेवा और राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। संघ को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों प्रकार के विचार मौजूद हैं, किंतु किसी भी संगठन को समझने का सर्वोत्तम तरीका उसके घोषित उद्देश्यों, संविधान, कार्यप्रणाली और संगठनात्मक व्यवस्था का अध्ययन करना है।
यह लेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीकरण, संविधान, सदस्यता व्यवस्था, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम तथा शाखा व्यवस्था का तथ्यात्मक परिचय प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। संघ का उद्देश्य समाज में संगठन, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना बताया जाता है।
आज RSS भारत के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है और इसकी शाखाएँ देश के हजारों नगरों, कस्बों और गाँवों में संचालित होती हैं।
क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत संस्था है?
उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है।
यह तथ्य समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा का विषय रहा है। हालांकि भारतीय कानून में प्रत्येक सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। अतः केवल पंजीकरण का अभाव किसी संगठन को स्वतः अवैध नहीं बनाता।
पंजीकरण के सामान्य लाभ होते हैं, जैसे:
- स्वतंत्र कानूनी पहचान,
- संपत्ति का स्वामित्व,
- बैंक खाते संचालित करने की सुविधा,
- अनुबंध करने की क्षमता,
- न्यायालय में संगठन के नाम से कार्यवाही।
इसके बावजूद भारत में अनेक प्रकार के स्वैच्छिक संगठन बिना औपचारिक पंजीकरण के भी कार्य कर सकते हैं, यदि वे कानून का पालन कर रहे हों।
RSS का लिखित संविधान
कई लोगों में यह भ्रम पाया जाता है कि RSS का कोई संविधान नहीं है। वास्तव में यह धारणा सही नहीं है।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद हुई प्रक्रियाओं के दौरान 1949 में संघ ने एक लिखित संविधान स्वीकार किया। आज संघ की संगठनात्मक संरचना और कार्यप्रणाली इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होती है।
RSS के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
1. संगठन का उद्देश्य
RSS के संविधान के अनुसार संगठन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना तथा राष्ट्र जीवन को सुदृढ़ बनाना है।
संघ के समर्थकों का मानना है कि "हिंदू समाज का संगठन" केवल धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास है।
2. स्वयंसेवक व्यवस्था
संघ में कार्य करने वाले व्यक्ति को "स्वयंसेवक" कहा जाता है। स्वयंसेवक संघ की मूल शक्ति माने जाते हैं।
3. सदस्यता प्रणाली
संघ की सदस्यता व्यवस्था अन्य संगठनों से भिन्न है।
सामान्यतः:
- सदस्यता फॉर्म नहीं भरा जाता,
- सदस्यता कार्ड जारी नहीं किया जाता,
- प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता।
व्यक्ति शाखा में भाग लेकर स्वयंसेवक के रूप में जुड़ता है।
4. सरसंघचालक
सरसंघचालक संघ का सर्वोच्च पद माना जाता है। वह संगठन का वैचारिक मार्गदर्शन करता है।
5. सरकार्यवाह
सरकार्यवाह संघ का प्रमुख कार्यकारी पदाधिकारी होता है और संगठन के दैनिक प्रशासनिक एवं संगठनात्मक कार्यों का संचालन करता है।
6. अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) संघ की सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था मानी जाती है। संगठन के महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय इसी मंच पर लिए जाते हैं।
स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया
चूंकि संघ में औपचारिक सदस्यता कार्ड की व्यवस्था नहीं है, इसलिए स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया पारंपरिक राजनीतिक दलों से भिन्न है।
संघ की परंपरा में सामान्यतः माना जाता है कि जिस दिन कोई व्यक्ति पहली बार शाखा में उपस्थित होकर भगवा ध्वज को प्रणाम करता है और शाखा की गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ करता है, उसी दिन से उसका स्वयंसेवक जीवन प्रारंभ माना जा सकता है।
हालांकि इसे औपचारिक सदस्यता प्रमाणपत्र के समान नहीं माना जाता।
RSS का भगवा ध्वज
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्वज भगवा ध्वज है।
यह साधारण भगवा रंग का ध्वज होता है, जिस पर सामान्यतः कोई चिन्ह अंकित नहीं होता।
संघ की दृष्टि में भगवा ध्वज प्रतीक है:
- त्याग का,
- तपस्या का,
- बलिदान का,
- आत्मसंयम का,
- राष्ट्र समर्पण का।
संघ में भगवा ध्वज को गुरु का स्थान
RSS की एक विशिष्ट परंपरा यह है कि वह किसी व्यक्ति को सर्वोच्च स्थान देने के बजाय भगवा ध्वज को "गुरु" का स्थान देता है।
संघ का मानना है कि व्यक्ति सीमित हो सकता है, जबकि आदर्श शाश्वत होते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति विशेष के बजाय आदर्शों के प्रतीक ध्वज को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है।
ध्वज प्रणाम का महत्व
संघ की शाखा में स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष ध्वज प्रणाम करते हैं।
संघ के अनुसार ध्वज प्रणाम:
- किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है,
- बल्कि आदर्शों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है।
ध्वज प्रणाम के माध्यम से स्वयंसेवक:
- अनुशासन,
- त्याग,
- समर्पण,
- राष्ट्रसेवा
की भावना व्यक्त करते हैं।
गुरु दक्षिणा की परंपरा
संघ में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर "गुरु दक्षिणा" कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
इस अवसर पर:
- भगवा ध्वज को गुरु मानकर प्रणाम किया जाता है,
- स्वयंसेवक स्वैच्छिक आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं,
- संगठन के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हैं।
शाखा: संघ की मूल इकाई
RSS की सबसे महत्वपूर्ण इकाई शाखा मानी जाती है।
देशभर में हजारों स्थानों पर नियमित शाखाएँ आयोजित की जाती हैं। शाखा सामान्यतः लगभग एक घंटे की होती है।
संघ के अनुसार शाखा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रसेवा की भावना का विकास करना है।
शाखा में क्या-क्या होता है?
1. ध्वज एवं प्रारंभ
शाखा की शुरुआत भगवा ध्वज के समक्ष अनुशासित रूप से एकत्र होकर की जाती है।
2. ध्वज प्रणाम
स्वयंसेवक ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।
3. शारीरिक व्यायाम
शाखा में निम्न गतिविधियाँ हो सकती हैं:
- योग,
- सूर्य नमस्कार,
- दौड़,
- दंड (लाठी) अभ्यास,
- सामूहिक व्यायाम।
इनका उद्देश्य शारीरिक क्षमता और अनुशासन का विकास करना बताया जाता है।
4. खेलकूद
शाखाओं में विभिन्न खेल आयोजित किए जाते हैं, जैसे:
- कबड्डी,
- खो-खो,
- दौड़ प्रतियोगिताएँ,
- समूह आधारित खेल।
इनका उद्देश्य सामूहिकता और टीम भावना विकसित करना होता है।
5. शारीरिक प्रशिक्षण
स्वयंसेवकों को:
- अनुशासन,
- समन्वय,
- नेतृत्व,
- आत्मविश्वास
का अभ्यास कराया जाता है।
6. बौद्धिक वर्ग
शाखा का एक महत्वपूर्ण भाग बौद्धिक चर्चा होती है।
इन चर्चाओं में विषय हो सकते हैं:
- भारतीय इतिहास,
- सामाजिक प्रश्न,
- राष्ट्रीय घटनाक्रम,
- महापुरुषों का जीवन,
- सांस्कृतिक परंपराएँ।
7. संगठनात्मक चर्चा
इस दौरान आगामी कार्यक्रमों, सेवा गतिविधियों और सामाजिक अभियानों की जानकारी दी जाती है।
8. संघ प्रार्थना
शाखा का समापन संघ प्रार्थना के साथ किया जाता है।
एक सामान्य शाखा का समय विभाजन
| गतिविधि | अनुमानित समय |
|---|---|
| ध्वज एवं प्रारंभ | 5 मिनट |
| व्यायाम एवं शारीरिक गतिविधियाँ | 15–20 मिनट |
| खेलकूद | 15–20 मिनट |
| बौद्धिक चर्चा | 10–15 मिनट |
| प्रार्थना एवं समापन | 5 मिनट |
निष्कर्ष
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत नहीं है, लेकिन इसका अपना लिखित संविधान, संगठनात्मक ढांचा और निर्धारित कार्यप्रणाली है।
संघ की पहचान उसकी शाखा व्यवस्था, स्वयंसेवक परंपरा, भगवा ध्वज, ध्वज प्रणाम, गुरु दक्षिणा, संगठनात्मक अनुशासन और समाज संगठन की अवधारणा से जुड़ी हुई है।
संघ के संविधान के अनुसार उसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना और राष्ट्र जीवन को सुदृढ़ बनाना है, जबकि उसके समर्थक इसे भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना को संगठित और सशक्त बनाने का प्रयास मानते हैं।
किसी भी संगठन के बारे में मत बनाने से पहले उसके घोषित सिद्धांतों, संरचना और कार्यप्रणाली को तथ्यात्मक रूप से समझना लोकतांत्रिक विमर्श की दृष्टि से आवश्यक है।
लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भारतीय जनता पार्टी नेता
No comments:
Post a Comment