कांग्रेस विभाजन, आपातकाल, दल-बदल और राज्य सरकारों की बर्खास्तगी का राजनीतिक विश्लेषण
लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
नेता भारतीय जनता पार्टी
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1966 से 1984 तक का कालखंड अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में श्रीमती इंदिरा गांधी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेता के रूप में उभरीं। उनके समर्थक उन्हें दृढ़ निश्चयी और निर्णायक प्रधानमंत्री मानते हैं, जबकि उनके आलोचक इस दौर को लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का काल बताते हैं।
आज भी भारतीय राजनीति में जब आपातकाल, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति की चर्चा होती है, तो इंदिरा गांधी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
1966: सत्ता की शुरुआत
लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। प्रारंभ में उन्हें कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त था, लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका पार्टी के पुराने नेतृत्व से टकराव शुरू हो गया।
1967: कांग्रेस की कमजोरी और दल-बदल की राजनीति
1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। पहली बार कांग्रेस को यह एहसास हुआ कि उसका राजनीतिक वर्चस्व चुनौती के घेरे में है।
इसी समय हरियाणा में "आया राम, गया राम" राजनीति का जन्म हुआ। विधायक और सांसद लगातार दल बदल रहे थे। उस समय कोई दल-बदल विरोधी कानून नहीं था।
1969: कांग्रेस का विभाजन
1969 में कांग्रेस दो भागों में बंट गई—
- कांग्रेस (ओ)
- कांग्रेस (आर) (इंदिरा गांधी गुट)
यह केवल संगठनात्मक विभाजन नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व-आधारित राजनीति की शुरुआत का बड़ा मोड़ माना जाता है। कांग्रेस के अधिकांश सांसद इंदिरा गांधी के साथ चले गए और पार्टी पर उनका व्यक्तिगत नियंत्रण बढ़ता गया।
बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्ति
इंदिरा गांधी ने 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। 1971 में पूर्व रियासतों के राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को समाप्त किया गया।
इन कदमों ने उन्हें गरीबों और मध्यम वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया, लेकिन आलोचकों ने इसे राजनीतिक समर्थन जुटाने की रणनीति भी बताया।
1971: भारी जीत और बढ़ती शक्ति
"गरीबी हटाओ" नारे के साथ इंदिरा गांधी ने 1971 का चुनाव भारी बहुमत से जीता। उसी वर्ष भारत-पाक युद्ध में विजय और बांग्लादेश के निर्माण ने उनकी लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया।
लेकिन इसी के साथ सत्ता का केंद्रीकरण भी बढ़ने लगा।
अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग
इंदिरा गांधी के शासनकाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग हुआ।
हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, ओडिशा, नागालैंड और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
आलोचकों का आरोप था कि कई मामलों में यह कदम संवैधानिक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए।
1975: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय – आपातकाल
25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया।
आपातकाल के दौरान:
- विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया।
- प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई।
- नागरिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया।
- राजनीतिक विरोध को दबाया गया।
जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस सहित अनेक विपक्षी नेता जेल में बंद रहे।
भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ की वैचारिक परंपरा में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार माना जाता है।
1976: तमिलनाडु की DMK सरकार की बर्खास्तगी
आपातकाल के दौरान तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त कर दिया गया।
यह घटना इस आरोप को और मजबूत करती है कि केंद्र सरकार राजनीतिक विरोध को समाप्त करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।
42वाँ संविधान संशोधन
1976 में 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया गया।
कई संवैधानिक विशेषज्ञ इसे संविधान के इतिहास का सबसे विवादास्पद संशोधन मानते हैं क्योंकि इससे केंद्र सरकार की शक्तियाँ काफी बढ़ गईं।
1977: जनता का फैसला
आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए चुनाव में जनता ने अपना निर्णय सुना दिया।
कांग्रेस पराजित हुई और जनता पार्टी सत्ता में आई।
यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जाती है क्योंकि जनता ने मतदान के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कर दिखाया कि लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति या दल से बड़ा है।
1978–79: जनता पार्टी में टूट और कांग्रेस की वापसी की तैयारी
जनता पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ने लगे।
इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) के माध्यम से अपना संगठन फिर से मजबूत किया। कई नेता और जनप्रतिनिधि पुनः उनके साथ आने लगे।
1980: सत्ता में वापसी और 9 राज्य सरकारों की बर्खास्तगी
1980 में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं।
सत्ता में लौटने के तुरंत बाद नौ विपक्षी राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया:
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- मध्य प्रदेश
- राजस्थान
- गुजरात
- हरियाणा
- पंजाब
- ओडिशा
- महाराष्ट्र
आलोचकों ने इसे संघीय ढाँचे और राज्यों के जनादेश पर सीधा आघात बताया।
दल-बदल की राजनीति
इंदिरा गांधी के पूरे कार्यकाल में विभिन्न दलों के सांसद और विधायक कांग्रेस में शामिल होते रहे।
चूँकि दल-बदल विरोधी कानून नहीं था, इसलिए सरकारों को अस्थिर करना और राजनीतिक समर्थन जुटाना अपेक्षाकृत आसान था।
यही कारण है कि 1967 से 1985 का काल भारतीय राजनीति में दल-बदल के युग के रूप में जाना जाता है।
शाह आयोग की टिप्पणियाँ
जनता सरकार ने आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया।
आयोग ने कई मामलों में सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक अतिरेक पर गंभीर प्रश्न उठाए।
बाद में क्या बदला?
इंदिरा गांधी के काल के अनुभवों के बाद भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण सुधार हुए:
- 1985 में दल-बदल विरोधी कानून लागू हुआ।
- 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई फैसले ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण रोक लगाई।
- राज्यों की निर्वाचित सरकारों को मनमाने ढंग से हटाना कठिन हो गया।
निष्कर्ष
इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की अत्यंत प्रभावशाली नेता थीं। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश निर्माण जैसी उपलब्धियाँ उनके नाम दर्ज हैं। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस का विभाजन, आपातकाल, अनुच्छेद 356 का व्यापक उपयोग, विपक्षी सरकारों की बर्खास्तगी और दल-बदल की राजनीति उनके शासनकाल के ऐसे पहलू हैं जिन पर आज भी गंभीर बहस होती है।
भाजपा और लोकतंत्र समर्थक विचारधारा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह काल हमें यह सीख देता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, सशक्त विपक्ष और जागरूक नागरिकों से होती है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि अंततः जनता ही सर्वोच्च होती है, और जनता का निर्णय किसी भी सरकार से बड़ा होता है।
— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भारतीय जनता पार्टी नेता
No comments:
Post a Comment