लेखक शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। संघ के लाखों स्वयंसेवक देशभर में विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक और सेवा गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद समय-समय पर एक प्रश्न चर्चा का विषय बनता है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकृत संस्था है, और यदि नहीं, तो क्या इसका पंजीकरण होना आवश्यक है?
इस विषय पर अनेक प्रकार की धारणाएं प्रचलित हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रश्न को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तथ्य और कानून के आधार पर समझा जाए।
क्या भारत में हर संगठन का पंजीकरण अनिवार्य है?
भारतीय संविधान नागरिकों को संगठन बनाने और संचालित करने का अधिकार देता है। सामान्यतः किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन का अस्तित्व केवल इसलिए अवैध नहीं माना जाता क्योंकि उसका औपचारिक पंजीकरण नहीं है।
पंजीकरण कराने से संगठन को कई प्रशासनिक और कानूनी सुविधाएं मिलती हैं, जैसे:
- अलग कानूनी पहचान,
- संपत्ति का स्वामित्व,
- बैंक खाते संचालित करने की सुविधा,
- अनुबंध करने की क्षमता,
- तथा न्यायालय में संगठन के नाम से कार्यवाही करने की सुविधा।
लेकिन प्रत्येक संगठन के लिए पंजीकरण हर स्थिति में अनिवार्य नहीं होता।
RSS की कानूनी स्थिति क्या है?
उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि संघ बिना किसी संरचना के कार्य करता है। संघ का अपना लिखित संविधान है, जो उसकी कार्यप्रणाली, संगठनात्मक व्यवस्था और जिम्मेदारियों को निर्धारित करता है।
1949 में संघ ने लिखित संविधान क्यों अपनाया?
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद संघ और सरकार के बीच हुई प्रक्रियाओं के दौरान 1949 में संघ ने एक लिखित संविधान अपनाया।
प्रतिबंध हटने के बाद से संघ अपनी गतिविधियां इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत संचालित करता आ रहा है।
यदि RSS पंजीकृत नहीं है तो उसकी संपत्तियां और संस्थान कैसे संचालित होते हैं?
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। वास्तविकता यह है कि संघ से संबंधित अनेक संस्थान, ट्रस्ट, समितियां, विद्यालय, प्रकाशन संस्थाएं और सेवा संगठन अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं।
इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से:
- भूमि और भवनों का प्रबंधन,
- बैंक खातों का संचालन,
- वित्तीय लेन-देन,
- दान का उपयोग,
- तथा विभिन्न सामाजिक और सेवा परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।
अर्थात संगठनात्मक गतिविधियां और प्रशासनिक-वैधानिक व्यवस्थाएं अलग-अलग संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं।
क्या बिना पंजीकरण के संगठन चलाना गैरकानूनी है?
इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
भारतीय कानून में केवल पंजीकरण न होना किसी संगठन को स्वतः अवैध नहीं बनाता। किसी संगठन की वैधता का निर्धारण उसके कार्यों, कानून के पालन और संबंधित नियमों के अनुपालन के आधार पर किया जाता है।
इसलिए केवल इस आधार पर कि कोई संगठन पंजीकृत नहीं है, उसे गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना भी आवश्यक है
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी बड़े संगठन, राजनीतिक दल, सामाजिक संस्था या वैचारिक संगठन के बारे में प्रश्न पूछना नागरिकों का अधिकार है। साथ ही तथ्यों के आधार पर उत्तर देना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति इस विषय पर अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, तो वह सार्वजनिक अभिलेखों, संबंधित विभागों के रिकॉर्ड तथा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के माध्यम से उपलब्ध सूचनाओं का अध्ययन कर सकता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत संस्था नहीं है, लेकिन इसका अपना लिखित संविधान और संगठनात्मक ढांचा है। संघ से संबंधित अनेक गतिविधियां विभिन्न पंजीकृत संस्थाओं और ट्रस्टों के माध्यम से संचालित होती हैं।
कानूनी दृष्टि से केवल पंजीकरण का अभाव किसी संगठन को अवैध नहीं बनाता। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय तथ्यों, कानून और उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों को आधार बनाना चाहिए, न कि केवल धारणाओं या राजनीतिक पूर्वाग्रहों को।
लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
नेता, भारतीय जनता पार्टी
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