Wednesday, October 28, 2026

मेरे सार्वजनिक जीवन की स्मृतियाँ

मेरे निवास का वह सोफा और कुर्सी, जिनसे जुड़ी हैं देश की अनेक महान विभूतियों की अविस्मरणीय स्मृतियाँ



कुछ स्थान केवल मकान नहीं होते, वे जीवन की यात्रा, संगठनात्मक समर्पण, आत्मीय संबंधों और इतिहास की यादों के साक्षी बन जाते हैं।

लेखक: शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भाजपा नेता एवं पूर्व राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा

जीवन में कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जिनका महत्व समय बीतने के साथ और अधिक बढ़ जाता है। कभी वे मुलाकातें सामान्य लगती हैं, लेकिन वर्षों बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एहसास होता है कि वे हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर बन चुकी हैं।

आज अपने निवास के कमरे में बैठे-बैठे जब मेरी दृष्टि उस पुराने सोफे और कुर्सी पर पड़ी, तो मन अतीत की अनेक यादों में खो गया। आँखों के सामने वे दिन जीवंत हो उठे, जब भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक कार्यों, चुनाव अभियानों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों के सिलसिले में अनेक वरिष्ठ नेताओं और संगठन के मार्गदर्शकों का मेरे निवास पर आगमन हुआ करता था।

मेरे लिए यह अत्यंत गर्व और आत्मीयता का विषय है कि जिन व्यक्तित्वों ने कभी मेरे घर के इसी बैठक कक्ष में बैठकर कार्यकर्ताओं से संवाद किया, चुनावी रणनीतियों पर चर्चा की और संगठनात्मक विषयों पर विचार-विमर्श किया, उनमें से अनेक आगे चलकर मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, राज्यसभा सांसद और भारत के राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे।

आज जब मैं अपने कमरे की इन वस्तुओं को देखता हूँ, तो मुझे केवल पुराना समय याद नहीं आता, बल्कि अपने सार्वजनिक जीवन की वह यात्रा भी याद आती है, जिसमें संगठन, समाज, आत्मीय संबंध और राष्ट्रसेवा की भावना प्रमुख रही है।

वर्ष 2006 का नगर निकाय चुनाव: मेरा निवास बना चुनावी बैठकों का केंद्र

वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव के दौरान वार्ड संख्या 49 से श्रीमती विमला रावत प्रत्याशी थीं और गाजियाबाद के महापौर पद के लिए श्रीमती दमयंती गोयल चुनाव मैदान में थीं। उस समय वार्ड संख्या 49 से संबंधित अधिकांश चुनावी बैठकें मेरे निवास पर आयोजित होती थीं।

कार्यकर्ताओं का आना-जाना, चुनावी चर्चाएँ, जनसंपर्क की योजनाएँ और संगठन के साथियों का उत्साह उस समय के वातावरण को जीवंत बनाए रखते थे। इसी चुनाव में श्रीमती दमयंती गोयल भारी मतों से विजयी हुईं और गाजियाबाद की महापौर बनीं।

चुनाव प्रचार के दौरान मेरे निवास पर राज्यसभा सांसद श्री भुवन चंद्र खंडूरी जी का भी आगमन हुआ। वे लगभग आधा दिन मेरे निवास पर रुके और कार्यकर्ताओं के साथ समय बिताया। बाद में उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला।

आज उन दिनों को याद करता हूँ, तो अनुभव होता है कि कार्यकर्ताओं के घर केवल बैठक करने के स्थान नहीं होते, बल्कि वे संगठनात्मक विश्वास, संवाद और आत्मीय संबंधों के महत्वपूर्ण केंद्र भी होते हैं।

वह सोफा, जिस पर बैठते थे भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी

मेरे निवास की स्मृतियों में उस सोफे का विशेष स्थान है, जिस पर आदरणीय श्री रामनाथ कोविंद जी कई बार बैठा करते थे।

भाजपा में संगठनात्मक दायित्वों के निर्वहन के दौरान मुझे उनके साथ कार्य करने और कई अवसरों पर साथ प्रवास करने का अवसर मिला। उस समय वे भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी थे। संगठनात्मक कार्यों के कारण हमारा नियमित संपर्क रहता था।

वे जब भी मेरे निवास पर आते, तो इसी सोफे पर बैठा करते थे। जब मैंने उनसे इस सोफे का उल्लेख करते हुए उससे जुड़ी अपनी भावनाएँ साझा कीं, तो उन्होंने सहजता और सकारात्मक भाव से उस पर बैठना स्वीकार किया। इसके बाद भी जब वे मेरे निवास पर आते, तो इस सोफे पर बैठने की बात करते थे।

धीरे-धीरे यह सोफा मेरे लिए केवल एक फर्नीचर नहीं रहा, बल्कि उनके साथ बिताए आत्मीय क्षणों और संगठनात्मक जीवन की यादों का प्रतीक बन गया।

वर्ष 2015 में आदरणीय रामनाथ कोविंद जी बिहार के राज्यपाल बने और वर्ष 2017 में भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। उनके इस गौरवपूर्ण सफर को देखकर मेरे मन में उन पुराने दिनों की स्मृतियाँ ताजा हो उठीं, जब वे मेरे निवास पर सहज भाव से बैठकर संगठनात्मक विषयों पर चर्चा किया करते थे।

मेरे लिए यह गर्व और प्रसन्नता का विषय रहा कि जिस व्यक्तित्व के साथ मुझे संगठन में कार्य करने और आत्मीय समय बिताने का अवसर मिला, वह आगे चलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचा।

आज भी जब मैं उस सोफे को देखता हूँ, तो उनके साथ बिताए वे क्षण स्मरण हो आते हैं। यह स्मृति मुझे बताती है कि जीवन में कुछ वस्तुओं का महत्व उनके भौतिक मूल्य से नहीं, बल्कि उनसे जुड़े संबंधों और अनुभवों से निर्धारित होता है।

आदरणीय डॉ. इंद्रेश कुमार जी के तीन प्रवास और संघ कार्य की स्मृतियाँ

मेरे निवास की स्मृतियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक आदरणीय डॉ. इंद्रेश कुमार जी का भी विशेष स्थान है।

उनका मेरे निवास पर तीन बार प्रवास हुआ। इन प्रवासों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण स्मृति यह है कि इसी सोफे पर बैठकर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को बैठक के लिए आमंत्रित किया था।

मेरे लिए वह केवल एक बैठक का प्रसंग नहीं था, बल्कि संगठनात्मक जीवन, विचार-विमर्श और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का आत्मीय क्षण था।

उनका मेरे निवास पर आना और वहाँ बैठकर स्वयंसेवकों के साथ संवाद करना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य का विषय रहा। इन अवसरों ने मुझे यह अनुभव कराया कि संगठन की शक्ति केवल बड़े कार्यालयों या सार्वजनिक मंचों में नहीं होती, बल्कि उन स्थानों में भी होती है, जहाँ कार्यकर्ता और मार्गदर्शक साथ बैठते हैं, विचार साझा करते हैं और समाज तथा राष्ट्र के लिए कार्य करने का संकल्प लेते हैं।

आज भी उस सोफे को देखकर डॉ. इंद्रेश कुमार जी के प्रवास और उनसे जुड़ी संगठनात्मक गतिविधियों की स्मृतियाँ मन में ताजा हो जाती हैं।

मेरे निवास पर गुरु दक्षिणा कार्यक्रम और अंबेडकर शाखा के स्वयंसेवक

मेरे सार्वजनिक और संगठनात्मक जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण अध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा गतिविधियों और गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों से जुड़ा है।

मेरे निवास पर कई बार गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। उन अवसरों पर क्षेत्र की अंबेडकर शाखा के अनेक स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा अर्पित करने के लिए मेरे निवास पर आया करते थे।

उन दिनों घर का वातावरण आत्मीयता, अनुशासन और संगठनात्मक भावना से भर जाता था। स्वयंसेवकों का एकत्र होना, परंपरा के अनुसार गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में सहभागिता करना और संगठन के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त करना मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभव रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरा में भगवा ध्वज को गुरु मानकर गुरु दक्षिणा अर्पित की जाती है। यह परंपरा श्रद्धा, त्याग, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण के भाव को अभिव्यक्त करती है।

मेरे निवास पर आयोजित ये कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहाँ घर की निजी सीमाओं से आगे बढ़कर संगठन के स्वयंसेवकों के साथ सामूहिक सहभागिता और वैचारिक जुड़ाव का अवसर मिलता था।

आज उन दिनों को याद करता हूँ, तो मन में विशेष संतोष होता है। अंबेडकर शाखा के स्वयंसेवकों का मेरे निवास पर एकत्र होना और गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों में सहभागिता करना मेरे जीवन की ऐसी स्मृतियाँ हैं, जिन्हें मैं हमेशा सम्मान के साथ संजोकर रखना चाहूँगा।

मेरे लिए ये केवल पुराने कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस दौर के जीवंत दस्तावेज हैं, जब मेरा निवास संगठनात्मक गतिविधियों और आत्मीय संवाद का केंद्र बना करता था।

वह कुर्सी, जिस पर बैठकर आदरणीय थावरचंद गहलोत जी एवं आदरणीय दुष्यंत कुमार गौतम जी ने बिताए आत्मीय पल

मेरे निवास की एक अन्य कुर्सी भी अनेक महत्वपूर्ण मुलाकातों की साक्षी रही है।

वर्ष 2010 में आदरणीय श्री रामनाथ कोविंद जी, भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव श्री थावरचंद गहलोत जी और श्री दुष्यंत गौतम जी मेरे निवास पर आए थे। उस अवसर पर आदरणीय रामनाथ कोविंद जी ने श्री थावरचंद गहलोत जी को उस कुर्सी पर बैठाया।

उस समय कुर्सी को लेकर हुई आत्मीय बातचीत और उसके प्रति व्यक्त सकारात्मक भाव आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं। आदरणीय रामनाथ कोविंद जी ने उस कुर्सी के संबंध में यह भाव व्यक्त किया था कि इसमें शक्ति है।

उस समय यह बात सहज बातचीत का हिस्सा थी, लेकिन बाद के वर्षों में इन व्यक्तित्वों की सार्वजनिक जीवन में उपलब्धियों को देखते हुए यह प्रसंग मेरी स्मृतियों में और भी विशेष बन गया।

वर्ष 2014 में श्री थावरचंद गहलोत जी भारत सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। आगे चलकर उन्होंने कर्नाटक के राज्यपाल का दायित्व भी संभाला।

आदरणीय श्री दुष्यंत गौतम जी से भी मेरे लंबे समय से संगठनात्मक संबंध रहे हैं। वे मेरे निवास पर कई बार आए और उनके साथ भी अनेक आत्मीय क्षण बिताने का अवसर मिला। उनके सार्वजनिक जीवन की यात्रा और महत्वपूर्ण दायित्वों को देखकर मुझे पुराने संगठनात्मक दिनों की याद आती है।

मेरे लिए इस कुर्सी का महत्व किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास के कारण नहीं, बल्कि उन व्यक्तित्वों के साथ जुड़ी स्मृतियों के कारण है, जिन्होंने यहाँ बैठकर आत्मीयता के साथ समय बिताया। कभी-कभी जीवन की साधारण वस्तुएँ भी असाधारण बन जाती हैं, क्योंकि उनसे जुड़ी यादें असाधारण होती हैं।

वर्ष 2007 का चुनाव और आज के कैबिनेट मंत्री श्री सुनील शर्मा

वर्ष 2007 में गाजियाबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी श्री सुनील शर्मा जी थे। चुनाव प्रचार के दौरान वे भी मेरे निवास पर आयोजित बैठकों में उपस्थित रहे।

उस समय चुनावी गतिविधियों के बीच कार्यकर्ताओं का जुटना, विचार-विमर्श करना और संगठन के लिए मिलकर काम करना सामान्य बात थी। आज श्री सुनील शर्मा जी को उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के दायित्व में देखकर मुझे उन दिनों की याद आती है, जब वे चुनाव प्रचार के सिलसिले में मेरे निवास पर बैठकों में शामिल हुआ करते थे।

राजनीतिक जीवन की यही विशेषता है कि समय के साथ पद और जिम्मेदारियाँ बदलती हैं, लेकिन पुराने संबंधों और संघर्ष के दिनों की स्मृतियों का महत्व बना रहता है।

आदरणीय श्री विद्यासागर सोनकर जी और अन्य वरिष्ठ नेताओं की स्मृतियाँ

मेरे निवास पर आदरणीय श्री विद्यासागर सोनकर जी का भी आगमन हुआ था। उस समय वे पूर्व सांसद थे। बाद में वे राज्यसभा के सदस्य बने।

इनके अतिरिक्त भी मेरे निवास पर अनेक वरिष्ठ नेताओं, राष्ट्रीय पदाधिकारियों और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों का आगमन हुआ है। हर मुलाकात की अपनी कहानी है और हर कहानी मेरे सार्वजनिक तथा संगठनात्मक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इन सभी अनुभवों ने मुझे यह समझने का अवसर दिया कि संगठनात्मक जीवन में संबंधों का महत्व पदों से कहीं अधिक स्थायी होता है। पद बदल सकते हैं, जिम्मेदारियाँ बदल सकती हैं, लेकिन आत्मीयता और साझा अनुभव लंबे समय तक स्मृतियों में जीवित रहते हैं।

मेरा निवास, मेरे परिवार और मेरे सार्वजनिक जीवन की साझा धरोहर

जब मैं इन सभी प्रसंगों को एक साथ याद करता हूँ, तो मन में अपने परिवार के प्रति भी कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।

मेरा निवास केवल मेरा निजी स्थान नहीं, बल्कि मेरे परिवार के जीवन का केंद्र भी है। यहाँ आने वाले अतिथियों का स्वागत करना, उनके साथ समय बिताना और उनके विचार सुनना हमारे जीवन का हिस्सा रहा है।

मेरे परिवार के लिए यह गौरव का विषय है कि इस घर में ऐसे अनेक व्यक्तित्व आए, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं और देश के सार्वजनिक जीवन में योगदान दिया।

मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि कौन कितने बड़े पद पर पहुँचा, बल्कि यह है कि मुझे ऐसे लोगों के साथ काम करने, उनसे सीखने और उनके साथ आत्मीय संबंध बनाए रखने का अवसर मिला।

आज मेरे निवास का यह सोफा और यह कुर्सी मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब यहाँ चुनावी बैठकों की गहमागहमी हुआ करती थी, वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श होता था, संघ के स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों के लिए एकत्र होते थे और राष्ट्र तथा समाज के लिए कार्य करने की भावना को बल मिलता था।

इन स्मृतियों में राजनीतिक जीवन भी है, संगठनात्मक अनुशासन भी, आत्मीय संबंध भी और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण भी।

नई पीढ़ी के लिए मेरा संदेश

अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभवों से मैं नई पीढ़ी को यही संदेश देना चाहता हूँ कि अपने कार्य, व्यवहार और संबंधों को सदैव महत्व दें।

जब आप संगठन, समाज या राष्ट्र के लिए ईमानदारी से काम करते हैं, तो अनेक लोगों के साथ आपका जुड़ाव बनता है। समय के साथ वही जुड़ाव आपके जीवन की अनमोल पूँजी बन जाता है।

जिन व्यक्तित्वों को हम आज बड़े संवैधानिक और राजनीतिक पदों पर देखते हैं, वे भी अपनी यात्रा के दौरान कार्यकर्ताओं, सहयोगियों और आम लोगों के बीच बैठते रहे हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के वर्तमान पद से अधिक महत्व उसके व्यवहार, विचार और समाज के प्रति योगदान का होना चाहिए।

मेरे निवास का यह सोफा और यह कुर्सी मेरे लिए इसी सीख के प्रतीक हैं। इनके साथ जुड़ी स्मृतियाँ मुझे याद दिलाती हैं कि जीवन की असली संपत्ति केवल धन या भौतिक वस्तुएँ नहीं, बल्कि अच्छे संबंध, साझा संघर्ष, विश्वास और समय के साथ संजोई गई यादें हैं।

आज जब मैं इन स्थानों को देखता हूँ, तो मन गर्व और कृतज्ञता से भर जाता है। यहाँ चुनावी बैठकों की गहमागहमी रही, संगठनात्मक चर्चाएँ हुईं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों में सहभागिता की और अनेक आत्मीय क्षणों ने मेरे जीवन को समृद्ध किया।

मेरे लिए यह निवास, यह सोफा और यह कुर्सी केवल घर की वस्तुएँ नहीं हैं। ये मेरे सार्वजनिक जीवन की यात्रा, संगठन के प्रति समर्पण और उन महान विभूतियों के साथ बने आत्मीय संबंधों की जीवंत स्मृतियाँ हैं।

मैं ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उसने मुझे ऐसे लोगों के साथ कार्य करने, उनसे सीखने और अपने जीवन में इन अविस्मरणीय क्षणों को संजोने का अवसर दिया।

क्योंकि अंततः जीवन की सबसे मूल्यवान धरोहर वे स्मृतियाँ हैं, जिन्हें हम समय बीत जाने के बाद भी सम्मान, आत्मीयता और गर्व के साथ याद करते हैं।

— शांत प्रकाश जाटव
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता मजदूर संघ
भाजपा नेता एवं पूर्व राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा

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